BudhaKedar Temple , Chamoli !! (बुढाकेदार मंदिर)

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिर “Budhakedar Temple , Chamoli !! (बुढाकेदार मंदिर)” के बारे में पूरी जानकारी देने वाले है , यदि आप बुढाकेदार मंदिर के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े |

Budhakedar Temple , Chamoli !! (बुढाकेदार मंदिर)




budhakedar-temple-chamoliबुढाकेदार मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में बाल गंगा और धरम गंगा नदियों के संगम पर स्थित प्राचीन एवम् पवित्र , धार्मिक मंदिर है । “बुद्ध” (“पुराना”) केदार मंदिर और गंगा नदियों (स्थानीय तौर पर धर्म प्रयाग के रूप में जाना जाता है) के संगम पर एक मंदिर है | यह मंदिर नई टिहरी से मोटर मार्ग से लगभग 59 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है | बुढाकेदार मंदिर भगवान शिव को समर्पित है | मंदिर के प्रवेश द्वार लकड़ी और पत्थर नक्काशी का एक शानदार संयोजन हैं । बूढ़ा केदार मंदिर में स्थित शिवलिंग की गहराई की नपाई अभी तक कोई नहीं कर पाया है परंतु ऊपरी ऊंचाई जमीन से लगभग 2 से 3 फीट की है इस , शिवलिंग पर भगवान शिव जी के अलावा कई अन्य आकृतियां भी बनी है जैसे कि माता पार्वती , भगवान गणेश , भगवान गणेश का वाहन मूषक , पांच पांडव , द्रोपदी , हनुमान और साथ ही मंदिर में भगवान केलापीर का निशान व माता दुर्गा की प्रतिमा भी रखी गई है | स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर में स्थित शिवलिंग का निर्माण मानव द्वारा नहीं बल्कि इस मंदिर में स्थित शिवलिंग की उत्पत्ति स्वयं हुई है , जो कि इस मंदिर को अपनी चमत्कारी शक्तियों के रूप में विशेष बनाती है |

बूढ़ाकेदार मंदिर इस नाम का अर्थ कुछ इस प्रकार है “बुढा” अर्थात “वृद्ध” वही “केदार” भगवान शिव के नाम अनेक नामों में से एक है | बूढाकेदार मंदिर में भगवान शिव से अपने वृद्ध स्वरूप में विराजमान हैं | भगवान के वृद्ध स्वरुप के पीछे यह कारण है कि पांडवों पर अपने ही कुल वंशों की हत्या का कलंक लगा था | इस कारण से मुक्ति पाने के लिए महर्षि व्यास द्वारा पांडवों को शिव की उपासना करने का सुझाव दिया गया , पांडवों ने भगवान शिव की उपासना की परंतु शिवजी भी पांडवों से नाराज थे और वह पांडवों के समक्ष नहीं जाना चाहते थे इसलिए उन्होंने व्रत नंदी बैल का रूप धारण कर लिया और हिमालय की घाटियों में अन्य जानवरों के बीच छुप गए परंतु भीम द्वारा शिव के इस रूप को पहचान लिया गया और जैसे ही भीम ने शिवजी जी के रूप को पकड़ना चाहा तो शिव का नंदी बैल रूप कई भागों में विभाजित हो गया | बूढ़ा केदार मंदिर में शिव के स्वरूप को पूजा जाता है इसलिए इस मंदिर को बूढ़ा केदार नाम दिया गया है |

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार , दुर्योधन ने इसी जगह पर तप किया था । पांडवों ने कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद भगवान शिव की खोज करने के निकले तब रास्ते में उनकी मुलाकात भृगु पर्वत पर ऋषि बालखिल्य से मुलाकात हुई । बालखिल्य ऋषि ने पांडवों का मार्गदर्शन किया और बताया की एक बूढ़ा आदमी संगम के पास ध्यान कर रहा है , तब पांडव उस जगह पहुँचे वो बूढ़ा आदमी अचानक शिव लिंग के पीछे गायब हो गया। बूढ़ाकेदार मंदिर इस शिवलिंग के ऊपर बनाया गया है । इस लिंग को उत्तरी भारत में सबसे बड़ा लिंग माना जाता है और इस पर अभी भी पांडवों के हाथ छाप है।

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