हल्द्वानी का इतिहास ! (History of Haldwani)

नमस्कार दोस्तों उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में हम आज आपको उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित “हल्द्वानी के इतिहास” के बारे में जानकारी देने वाले है , इसलिए इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े |

हल्द्वानी के निकट नैनीताल शहर के 10 विभिन्न पर्यटन स्थल , मंदिर आदि के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक कर पोस्ट को जरुर पढ़े |



About Haldwani

उत्तराखंड के भारतीय राज्य में हल्द्वानी तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर है । यह कुमाऊं क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर भी है | हल्दवानी नैनीताल जिले में स्थित है , और इसके आठ उपखंडों में से एक है | कुमाऊं हिमालय के तत्काल तलहटी में स्थित होने के नाते हल्द्वानी को “गेटवे ऑफ कुमाऊं” अर्थात “कुमाउं का प्रवेश द्वार” के रूप में भी जाना जाता है | हल्द्वानी शहर समुन्द्र तल से लगभग 424 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है | हल्द्वानी क्षेत्र में हिंदी , कुमाउनी , पंजाबी आदि भाषा बोली जाती है | (हल्द्वानी का इतिहास )

हल्द्वानी का इतिहास (History of Haldwani)

haldwani history in hindiहल्द्वानी शहर अपने आप में बहुत बड़ा इतिहास समेटी हुए है | हल्द्वानी शहर की स्थापना सन 1834 में हुई थी। उस समय हल्द्वानी “पहाड़ का बाज़ार” नाम से जाना जाता था । तब यहाँ ‘हल्दू’ के पेड़ अधिक संख्या में पाये जाते थे , जिस कारण इस स्थान का नाम ‘हल्द्वानी’ पड़ा | जिसे यहां की स्थानीय भाषा “हल्द्वाणी” नाम से भी जाना जाता है । मुगल इतिहासकारों का कहना है कि 14 वीं शताब्दी में , एक स्थानीय शासक , चंद वंश के ज्ञान चंद ने दिल्ली सल्तनत का दौरा किया और सुल्तान से अनुदान के रूप में गंगा तक भाभार-तराई के क्षेत्रों को प्राप्त किया । बाद में , मुगलों ने पहाड़ियों पर कब्जा करने की कोशिश की , लेकिन क्षेत्र की कठिन पहाड़ी भूमि के कारण वे इस कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सके ।  (हल्द्वानी का इतिहास) 

और ऐसा कहा जाता है कि सन 1816 में यहां जब राजा रूपचंद का शासन हुआ करता था तब से ही ठंडे स्थानों से लोग यहां सर्दियों का समय व्यतीत करने के लिये आया करते थे । सन् 1815 में जब यहां गोरखों का शासन था तब अंग्रेज कमिश्नर गार्डनर के नेत्रत्व में अंग्रेजों ने गोरखों को यहां से भगाया । गार्डनर के बाद जब जॉर्ज विलियम ट्रेल यहां के कमिश्नर बन कर आये तब उन्होंने इस हल्द्वानी शहर को बसाने का काम शुरू किया । ट्रेल ने सबसे पहले अपने लिये यहां बंग्ला बनाया , जिसे आज भी “खाम का बंग्ला” कहा जाता है । सन् 1882 में रैमजे ने पहली बार नैनीताल से काठगोदाम तक एक सड़क का निर्माण करवाया था। 24 अप्रेल 1884 को पहली बार काठगोदाम में रेल का आगमन हुआ था जो कि लखनऊ से काठगोदाम आयी थी।




1 9 01 में, 6624 की आबादी के साथ , हल्द्वानी “संयुक्त राष्ट्र” के नैनीताल जिले के भाभार क्षेत्र का मुख्यालय था , और यह कुमाउं प्रभाग के अधिकारियों और नैनीताल जिले के शीतकालीन मुख्यालय भी बनता था । 1901 में आर्य समाज भवन और 1902 में सनातन धर्म सभा का निर्माण हुआ था । तहसील का कार्यालय 1899 में यहां खोला गया , जब वह नैनीताल जिले के चार हिस्सों में से एक भाभर के तहसील मुख्यालय बन गया और इसमें 4 कस्बों और 511 गांव शामिल थे , और 1,297 वर्ग मीटर में फैली 93,445 ( सन 1901 ) की कुल जनसंख्या थी । हालांकि 1891 में नैनीताल जिले के गठन से पहले , यह कुमाउं जिले का हिस्सा था , जिसे बाद में अल्मोड़ा जिला कहा जाता था। सन 1904 में इसे ‘अधिसूचित क्षेत्र’ के रूप में शामिल किया गया था और सन 1907 में हल्द्वानी को शहर क्षेत्र का दर्जा मिला था । हल्द्वानी-काठगोदाम नगर परिषद की स्थापना 21 सितंबर , 1942 को हुई थी । वर्तमान में “हल्द्वानी” हरिद्वार के बाद उत्तराखंड का दूसरा सबसे बड़ा नगर परिषद है। ( हल्द्वानी का इतिहास )

उम्मीद करते है कि आपको “हल्द्वानी के इतिहास”  के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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