विष्णुप्रयाग का इतिहास , पौराणिक मान्यताये एवम् आकर्षण स्थल (History, Mythological Beliefs and Attractions of Vishnuprayag)

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड में स्थित 5 प्रयाग में से सर्वप्रथम प्रयाग “विष्णुप्रयाग” के बारे में जानकारी देने वाले है | ( विष्णुप्रयाग का इतिहास , पौराणिक मान्यताये एवम् आकर्षण स्थल )

और इससे पहले की पोस्ट में हमने रुद्रप्रयाग , देवप्रयाग , कर्णप्रयाग , नंदप्रयाग के बारे में जानकारी दी थी | यदि आपने वो पोस्ट नहीं पढ़ी तो निचे दिए गए लिंक में क्लिक कर रुद्रप्रयाग , देवप्रयाग , कर्णप्रयाग , नंदप्रयाग के बारे में जरुर पढ़े |

विष्णुप्रयाग का इतिहास (History of Vishnuprayag)

Beliefs of Vishnuprayag “विष्णुप्रयाग” उत्तराखंड के प्रसिद्ध पंच प्रयागों और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह भारत के प्रसिद्ध संगम स्थलों में से एक है। यह समुद्र तल से 1372 मी की ऊँचाई पर स्थित है | “विष्णुप्रयाग” विष्णु गंगा (धौली गंगा) तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर स्थित है। अलकनंदा का उद्गम स्थल “सतोपंथ” है और धौलीगंगा नदी का उद्गम स्थल “नीति पास” है और यह बड़े वागे से अलकनंदा में मिलती है | यह जोशीमठ-बद्रीनाथ मोटर मार्ग पर स्थित है | जोशीमठ से आगे मोटर मार्ग से 12 km और पैदल मार्ग से 3 km की दुरी पर विष्णुप्रयाग स्थित है | मंदाकिनी एवम् धौली गंगा के संगम पर स्थित इस पवित्र स्थान पर नारद ने अष्टाक्षरी जप से भगवान विष्णु को प्रसन्न किया था और यह भी कहा जाता है कि यहाँ भगवान् विष्णु न्रसिंह अवतार में समाधिस्‍थ हुए थे | संगम पर भगवान विष्णु जी प्रतिमा से सुशोभित प्राचीन मंदिर और विष्णु कुण्ड दर्शनीय हैं | पंच प्रयाग में देवप्रयाग के बाद “विष्णुप्रयाग” का विशेष महत्व माना जाता है |

स्कन्दपुराण में विष्णुप्रयाग को वर्णन विस्तार से किया गया है | विष्णुप्रयाग में विष्णुगंगा में 5 तथा अलकनंदा में 5 कुंडों का वर्णन आया है | इसी जगह से सूक्ष्म बदरीकाश्रम की शुरुवात होती है | दूर दूर से आने वालो श्रधालुओ की सुविधा के लिए सन 1921 ई में चट्टानों को काट कर विष्णुकुंड तक सीढ़िया बनायीं गई | इस संगम स्थल पर स्नान का विशेष महत्व है | विष्णुप्रयाग का शांत वातावरण और झील के स्वच्छ जल में पर्वतो का प्रतिबिम्ब दिखाई देना बहुत ही मनोहारी लगता है |(विष्णुप्रयाग का इतिहास , पौराणिक मान्यताये एवम् आकर्षण स्थल )

विष्णुप्रयाग से आगे स्थित धाम “बद्रीनाथ धाम” के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी पाने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे |

विष्णुप्रयाग की पौराणिक मान्यताये (Mythological Beliefs of Vishnuprayag)

1. जैसा की नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि विष्णुप्रयाग का नाम “भगवान विष्णु” के नाम पर रखा गया है | विष्णुप्रयाग की मान्यता के अनुसार यह कहा जाता है कि नारद मुनि ने इसी स्थान पर भगवान् विष्णु की तपस्या की थी और तपस्या में नारद मुनि ने पंचाक्षरी मंत्र का जाप किया और खुद भगवान विष्णु नारद मुनि को दर्शन देने के लिए इस स्थान में नारद मुनि के समक्ष पधारे थे |

2. पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह जगह है जहां साधु नारद तप है, जिसके बाद भगवान विष्णु से पहले उसे दिखाई दिया | विष्णुप्रयाग में भगवान विष्णु का मंदिर भी है | जिसके निर्माण का सारा श्रेय इंदौर की महारानी अहिल्याबाई को दिया जाता है | महारानी ने सन 1889 में भगवान् विष्णु के मंदिर का निर्माण कराया था |

3. विष्णुप्रयाग में दायीं और बायीं ओर दो पर्वत हैं, जिन्हें भगवान विष्णु के द्वारपालों, “जय” और “विजय” के रूप में जाना जाता है। इनमें से दायें पर्वत को “जय” और बायें पर्वत को “विजय” माना जाता है | (विष्णुप्रयाग का इतिहास , पौराणिक मान्यताये एवम् आकर्षण स्थल) 

विष्णुप्रयाग के आकर्षण स्थल (Attractions of Vishnuprayag)

विष्णुप्रयाग का इतिहास

भगवान विष्णु मंदिर :- यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है | किंवदंतियों का मनाना है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु ने दिव्य साधू नारद को आशीर्वाद दिया था | मंदिर प्रागण में प्रवेश करते ही मन को शांति और हृदय को आनंद महसूस होता है | इस मंदिर के अन्दर भगवान विष्णु की एक प्राचीन मूर्ति है |

Temples of vishnuprayag

नरसिंह मंदिर :- श्री नरसिंह मंदिर “जोशीमठ” की एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवम् ऐतिहासिक विरासत है | भगवान श्री बद्रीविशाल की गद्दी शीतकालीन प्रवास में यही विराजमान होती है | पुराणों के अनुसार भगवान श्री नरसिंह जी के दर्शन के उपरांत ही श्री बद्रीनाथ जी के दर्शनों की परम्परा है और पौराणिक काल में यह नगरी “कार्तिकेयपुर” नाम से जानी जाती है |

history of Vishnuprayag in Hindi

हनुमान चट्टी :- यह मंदिर बद्रीनाथ धाम से कुछ किलोमीटर पहले स्थित है | पौराणिक आख्यान है कि हनुमान जी ने इस स्थान पर तपस्या की थी ।त्रेता के बाद द्वापर मेँ जब पाण्डव इस क्षेत्र मेँ विचरण कर रहे थे तो उन्होँने भी हनुमान जी को यहीँ तप करते हुए देखा था | इस मंदिर के पीछे हनुमान और पांडव पुत्र भीम के बीच की कहानी है | आज भी बदरीनाथ जाने वाले यात्री यहाँ पर पूजा अर्जना करते है |

विष्णुप्रयाग में विष्णु कुण्ड, ब्रह्म कुण्ड, गणेश कुण्ड, भृंगी कुण्ड, ऋषि कुण्ड, सूर्य कुण्ड, दुर्गा कुण्ड, ध्रंधा कुण्ड तथा प्रह्‌लाद कुण्ड और अलकनंदा-धौलीगंगा संगम आदि प्रमुख हैं | यदि आप जोशीमठ में ठहरते है तो आपको औली रोपवे , हाथी पर्वत , कल्पवृक्ष , भविष्य बद्री , गणेश गुफा , व्यास गुफा , भीम पुल , भविष्य केदार और तपोवन जोशीमठ आदि स्थलों का लुफ्त उठाना चाहिए | (विष्णुप्रयाग का इतिहास , पौराणिक मान्यताये एवम् आकर्षण स्थल)

उम्मीद करते है कि आपको “विष्णुप्रयाग का इतिहास , पौराणिक मान्यताये एवम् आकर्षण स्थल”  के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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