उत्तराखंड का स्वादिष्ठ फल : काफल , ( स्वास्थ , औषधिक गुण एवम् अन्य महत्वपूर्ण जानकारी !! ) ( Kafal , Healthy Fruit of Uttarakhand !!Uttarakhand )

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन कि इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में पाए जाने “ उत्तराखंड स्वादिष्ठ फल “काफल” ” के बारे में जानकारी देने वाले हैं , यदि आप उत्तराखंड आते है तो “काफल” का स्वाद जरुर ले | अब आगे हम आपको “ उत्तराखंड का स्वादिष्ठ फल : ” काफल ” , ( स्वास्थ , औषधिक गुण एवम् अन्य महत्वपूर्ण ) सम्बंधित सारी जानकरी पोस्ट में बताने वाले हैं | यदि आप यह सारी जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं , तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !

Healthy Fruit of Uttarakhand : Kafal !! (उत्तराखंड का स्वादिष्ठ फल : काफल )





उत्तराखंड राज्य में कई प्राकृतिक औषधीय वनस्पतियां पाई जाती हैं , जो हमारी सेहत के लिए बहुत ही अधिक फायदेमंद होती हैं। बहुत ही कम लोग खासकर की शहरों में बसने वाले लोगों को इस पहाड़ी फल के बारे में जानकारी नहीं है। इस फल का नाम है “काफल” । काफल का फल जमीन से 4000 फीट से 6000 फीट की उंचाई में उगता है। ये फल उत्तराखंड के अलावा हिमाचल और नेपाल के ​कुछ हिस्सों में भी होता है । इस फल का स्वाद मीठा व खट्टा और कसैले होता है । यह एक सदाबहार वृक्ष हैं | इस फल का वैज्ञानिक नाम ” myrica esculenta” कहा जाता है एवम् इसे बॉक्स मर्टल और बेबेरी भी कहा जाता है। काफल फल के पौधे को कही भी उगाया नहीं जा सकता हैं | यह स्वयं उगने वाला पौधा हैं | मार्च के महीने से काफल के पेड में फल आने शुरू हो जाते हैं और अप्रैल महीने की शुरुवात के बाद यह हरे-भरे फल लाल हो जाते हैं | आयुर्वेद में काफल को भूख की अचूक दवा माना जाता हैं यानी कि यह फल भूख बढाता हैं |

काफल : उत्तराखंड स्वादिष्ठ फल खाने के फ्यादे !! (Benefits of Uttarakhand Healthy Fruit – Kafal)

  • जंगल में पाए जाने वाले काफल फल एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों के कारण मनुष्य के शरीर के लिए काफी फ्यादेमंद होता हैं एवम् फल अत्यधिक रस-युक्त और
    पाचक होता हैं |
  • काफल फल में कई तरह के प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं। जैसे माइरिकेटिन, मैरिकिट्रिन और ग्लाइकोसाइड्स इसके अलावा इसकी पत्तियों में फ्लावेन –
    4′-हाइड्रोक्सी-3 पाया जाता है।
  • इस फल को खाने से पेट से सम्बंधित कई बीमारियाँ दूर हो जाती हैं जैसे कि कब्ज हो या एसिडिटी |
  • फल के ऊपर मोम के प्रकार के पदार्थ की परत होती है जो कि पारगम्य एवं भूरे व काले धब्बों से युक्त होती है | यह मोम मोर्टिल मोम कहलाता है तथा
    फल को गर्म पानी में उबालकर आसानी से अलग किया जा सकता है | यह मोम अल्सर की बीमारी में प्रभावी होता है | इसके अतिरिक्त इसे
    मोमबत्तियां, साबुन तथा पॉलिश बनाने में उपयोग में लाया जाता है |
  • काफल फल के पेड की छाल से निकलने वाले सार को दालचीनी और अदरक के साथ मिलाकर सेवन करने से पेचिस , बुखार , फेफड़ो की बिमारी ,
    अस्थमा और डायरिया आदि रोगों से आसानी से बच सकते हैं अपितु यही नहीं इसकी छाल को सूघने से आँखों के रोग व सिर का दर्द आदि रोग भी ठीक
    हो सकते हैं |
  • इसके पेड़ की छाल का पाउडर जुकाम, आँख की बीमारी तथा सरदर्द में सूघने के रूप में प्रयोग में लाया जाता है |
  • काफल के पेड की छाल या इसके फुल से बने तेल की कुछ मात्र कान में डालने से कान का दर्द दुर किया जा सकता हैं एवम् दांत दर्द में इसके तेल की
    बूंदे रुई में डालकर दांत दर्द वाले हिस्से पर रख कर दांत दर्द ठीक हो जाता हैं |
  • इस फल से लकवा रोग ठीक हो जाता है और फल के प्रयोग से आप नेल पॉलिश के अलावा मोमबत्तियां व साबुन आदि को बना सकते हो।

जाने उत्तराखंड में उत्पन्न होने वाले स्वादिष्ठ फल काफल से जुडी कहानी के बारे में |





देवभूमि उत्तराखंड के जंगलो में पेड़ो में उत्पन्न होने वाला फल “काफल″ अपनी खुबियो से पर्यटकों एवम् लोगो को अपनी ओर आकर्षित कर लेता हैं | मनुष्य के शरीर को हमेशा जवान रखने वाले इस फल से जुडी कहानी बहुत ही मार्मिक हैं , जिसे पढ़कर आपकी आँखों में भी आसू आ जायेंगे |

उत्तराखंड में उत्पन्न होने वाले काफल फल से जुडी कहानी के बारे में यह कहा जाता है कि बहुत समय पहले उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव में गरीब महिला और उसकी छोटी-सी बेटी रहती थी | वह दोनों माँ बेटी एक दुसरे का सहारा थी | उस महिला के पास एक छोटी-सी जमीन के अलावा आमदनी के लिए कुछ नहीं था मगर उस जमीन से बहुत ही मुश्किलों से गुज़ारा चलता था | गर्मियों के मौसम में जैसे ही काफल पक जाते महिला बेहद खुश हो जाती थी और काफल बेचकर महिला को घर का खर्चा चलाने का जरिया मिल जाता था | काफल बाज़ार में बेचकर महिला की मुश्किले कुछ कम हो जाती थी |

एक बार महिला जंगल से टोकरी भर के काफल लाई , उस वक़्त सुबह का समय था और उसने जानवरों के लिए चारा लेने जाना था , तब महिला ने मन बनाया कि काफल को बेचने के लिए शाम को जायेगी और थोड़ी ही देर बाद महिला ने अपनी मासूम बेटी को बुलाकर कहा ” मैं जंगल से चारा काट कर आ रही हु , तब तक तू इन काफ़लो की पहरेदारी करना , मैं जंगल से आकर तुझे काफल खाने को दूंगी , पर तब तक इन काफ़लो को मत खाना ” | काफलो की पहरेदारी के दौरान रसीले काफलो को देख कर उसके मन में लालच आया लेकिन माँ की बात याद कर वह खुद पर काबू करके अपने मन को शांत कर लेती | इसके बाद जब उसकी माँ घर आई तो देखा कि काफलो की टोकरी से एक तिहाई भाग कम हैं और उसकी बेटी सो रही है | सुबह से काम पर लगी उस बच्ची की माँ ने यह सब देखा तो उसे गुस्सा आ गया और उसकी माँ ने सोचा कि मेरे मना करने के बाद भी उसकी बेटी ने काफल खा लिए | काफल कम होने के कारण गुस्से में उसकी माँ ने अपनी सोती हुई बेटी की पीठ पर मुट्ठी से जोरदार प्रहार किया | नींद की अवस्था में होने के कारण छोटी बच्ची को मुट्ठी से तेज़ लगने के कारण बच्ची अचेत अवस्था में बेसुध हो गई | बेटी को बेसुध देखकर माँ ने उसे खूब हिलाया , लेकिन तब तक उसकी बेटी की मौत हो चुकी थी , माँ अपनी बेटी की इस तरह की मौत के कारण वही बैठकर रोटी रही और शाम होते-होते काफल की टोकरी फिर से पूरी भर गई | जब महिला ने काफल से भरी टोकरी पर नज़र डाली तो उसकी समझ में आया कि दोपहर की दिन की चटक धुप के कारण काफल मुरझा गए थे और शाम की ठंडी हवा लगते ही वह फिर ताजे हो गए | यह सब देखकर छोटी बच्ची की माँ को अपनी करनी पर पछतावा हुआ और वह भी उसी स्थान पर सदमे से गुज़र कर मर गई |

ऐसा कहा जाता है कि वह बच्ची आज भी “घुघुती” चिड़िया बन कर अमर है और वह चिड़िया चैत के महीने में झुंडों में घुमते हैं और आवाज़ लगाती हैं । “काफल पाको, मैल नि चाखो” जिसका अर्थ है कि “काफल पक गए , मैंने नहीं चखे” और फिर दूसरी चिड़िया “पुरे है बेटी , पुरे है” | गाते हुए उडती हैं | यह कहानी जितनी दिल को छूने वाली हैं , उतनी ही उत्तराखंड में काफल की महत्वपूर्णता को भी दर्शाती हैं | वर्तमान समय में कई गाँव के लोग काफल को जंगल से तोड़कर बेचने के बाद अपनी रोजी रोटी की व्यवस्था करते हैं | काफल के महत्व पर एक लोकगीत भी है , जिसमे वह खुद को देवताओं के खाने योग्य समझता है | कुमाउनी भाषा के लोक गीत में काफल अपना दर्द बयाँ करते हुए कहते है , “खाणा लायक इंद्र का , हम छियां भूलोक आई पणा | इसका मतलब हैं कि हम स्वर्ग लोक में इंद्रा देवता के खाने योग्य थे और अब भू लोक में आ गए” | ऊपर बताई गई लोककथा से भी इस फल के महत्व को जाना जा सकता है |





उम्मीद करते है कि आपको ” उत्तराखंड का स्वादिष्ठ फल : ” काफल ” , ( स्वास्थ , औषधिक गुण एवम् अन्य महत्वपूर्ण जानकारी !! ) ” के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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