“मोटेश्वर महादेव” मंदिर का इतिहास !

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मोटेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास एवं मान्यता –

मोटेश्वर महादेव मंदिर भगवान भीम शंकर महादेव के रूप में भी जाना जाता है जो उत्तराखंड राज्य में   उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर गाँव में भगवान शिव का मंदिर है। शिवलिंग की मोटाई अधिक होने के कारण ही इसे मोटेश्वर के नाम से जाना जाता है| प्राचीन काल में, इस जगह को डाकिनी राज्य के रूप में जाना जाता था। यहाँ, भगवान शिव एक ज्योतिर्लिंग के रूप में देखा जा सकता है जिसे भीम शंकर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान शिव पीठासीन देवता हैं लेकिन इस प्राचीन मंदिर में कुछ अन्य देवताओं की भी पूजा की जाती है। इसमें भगवान गणेश, कार्तिकेय स्वामी, देवी पार्वती, देवी काली, भगवान हनुमान और भगवान भैरव शामिल हैं। मोटेश्वर महादेव मंदिर का धार्मिक महत्व है और यह मंदिर शिव भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है।





मोटेश्वर महादेव मंदिर

महाभारत कालीन महादेव मंदिर का शिवलिंग 12वां उप ज्योतिर्लिंग है। शिवलिंग की मोटाई अधिक होने के कारण यह मोटेश्वर महादेव मंदिर के नाम से विख्यात है। स्कंद पुराण में भगवान शिव ने कहा कि जो भक्त कांवड़ कंधे पर रखकर हरिद्वार से गंगा जल लाकर यहां चढ़ाएगा, उसे मोक्ष मिलेगा। इसी मान्यता के चलते मन्नत पूरी होने पर यहा लोग कांवड़ चढ़ाते हैं।

चैती मैदान में महादेव नगर के किनारे मोटेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। यहां रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु पूजा करने आते हैं। हर साल महाशिवरात्रि पर्व पर यहां भव्य मेला लगता है। यूपी के जिला मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, ठाकुरद्वारा से कई श्रद्धालु यहां हर साल कांवड़ चढ़ाने आते हैं। शिवरात्रि में एक दिन पहले से मंदिर में भक्तों की लाइन लग जाती है और आधी रात से कांवड़ चढ़नी शुरू हो जाती है। मोटेश्वर महादेव मंदिर दूसरी मंजिल पर है। शिवलिंग के चारों ओर तांबे का फर्श बना है। यह मंदिर जागेश्वर के कारीगर ने बनाया है। मोटाई अधिक होने के कारण शिवलिंग किसी व्यक्ति की कोलिया में नहीं आता।

मोटेश्वर महादेव मंदिर की मान्यताए –

मान्यतानुसार यह शिवलिंग स्थापित नहीं है बल्कि जमीन से टिका है। इसे बारहवां उप ज्योतिर्लिंग माना जाता है। कहते हैं कि यह मूल रूप से महाराष्ट्र स्थित भीम शंकर ज्योतिर्लिंग का ही रूप है। कई लोगों ने इसकी गहराई नापने की कोशिश की लेकिन नहीं नाप सके। लोगों का अनुमान है कि शिवलिंग की गहराई लगभग 30 फुट है। पहले इसका भूतल खुला था किन्तु 1942-43 में मंदिर के भूतल में भगदड़ मचने से तीन-चार लोगों की मृत्यु हो गई थी अतः सुरक्षा की दृष्टि से तब से भूतल बंद कर दिया गया। अब ऊपरी मंजिल पर मंदिर है। कहते हैं पहले मंदिर का फर्श शुद्ध  पीतल का था। तब एक श्रद्धालु ने उसके स्थान पर जयपुर से बैलगाड़ियों पर  संगमरमर का पत्थर मंगाकर लगवाया और ने पीतल को गलाकर उसका घंटा बनवा कर लगवा दिया। मंदिर की अन्दरूनी दीवारें कई कोणों में बनी हैं। बहुत से श्रद्धालुओं ने कई बार मंदिर का जीर्णोद्धार किया।1980 में सेठ मूलप्रकाश की मन्नत पूरी होने पर उन्होंने संपूर्ण मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।





यहां के पुजारी के अनुसार यह मंदिर द्वापरयुगीन हैं। मान्यता है कि गुरु द्रोणाचार्य गोविशाण में कौरव-पांडवों को शिक्षा दे रहे थे, तभी द्रोणाचार्य को शिवलिंग दिखाई दिया। तब भीम ने वहां पर मंदिर बनाकर द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा में दिया। किसी समय इस मंदिर को घेरे हुए 120 शिव मंदिर थे। एक गुजराती नागर ब्राह्मण परिवार नौ पीढ़ियों से मंदिर की सेवा कर रहा हैं। उन्हीं के अनुसार बुक्शा जनजाति के लोगों के कुल देवता महादेव हैं। यह भी मान्यता है कि यह शिवलिंग भगवाण राम के जन्म से भी पहले का है और यहां माता सीता ने भी तपस्या, अर्चना की थी

Google Map Of Moteshwar Mahadev Temple Kashipur

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