जानिए? भैयादूज क्यों मनाया जाता हैं History Of Bhaiya Duj festival

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जानिए भैया दूज क्यों मनाया जाता है? Histoy of Bhaiya Duj Festival 

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में “हिन्दू घर्म में मनाया जाने वाला पवित्र पर्व भैयादूज”History  of Bhaiya Duj Festival  के बारे में बताने वाले है। यदि आप जानना चाहते है। भैयादूज की मान्यताएं इतिहास एंव पौराणिक कथा Bhaiya Duj तो इस पोस्ट को अन्त तक जरूर पढ़े।


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भैयादूज त्यौहार की मान्यताएं एंव इतिहास-


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भैया दूज हिन्दू धर्म में मनाया जाने वाला एक पवित्र पर्व है। जिसे भाई-बहन के रिश्ते को प्यार की डोर से मजबूत करने वाला त्यौहार माना जाता है। ये त्यौहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वतीया तिथि को यानी दिपावली के दूसरे दिन मानाया जाता है। इसे भैयादूज या यमद्वतिया के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सभी बहने अपने भाई को रोली चंदन का टिका लगाकर तथा चूड़े (भने चावल) में तेल लगाकर चड़ाते है। और भाई की उज्जवल भविष्य की मनोकामना करती है। इस त्यौहार को सभी भाई- बहन बड़े धूमधाम तथा हर्षोउल्लास से मनाते है। उत्तराखंड में चूड़े यानी चावल को चड़ाते समय,  बहुत ही सुन्दर तरीके से आर्शीवाद देते समय बहन भाई को बोलती है।

“जी रैया जागी रैया, यो दिन यो बार भेटन रैया, आसमान बाराबर उच हैया,धरती बाराबर चैड़, स्याव बराबर चतुर हैया,तितुर बराबर तेज, लाग आठु,लाग सातु,यो दिन यो बार भेटन रैया”।

अर्थात आप हमने खुश रहना शुखी रहना। आसमान के बारबर ऊंचा उठ जाना।धरती के बराबर चैड़ा हो जाना। हिरन बराबर चालाक होना और तितुर के बारबर तेज होना। और हर त्यौहार में हम ऐसी मिलते रहे। ये आर्शीवाद देती है बहन |
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पौराणिक कथा के अनुसार भैयादूज


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पौराणिक कथाओं के अनुसार बताया जाता हैं कि यमराज की बहन यमुना अपने भाई से बहुत स्नेह करती थी। वह उन्हें हमेशा याद करती थी और उनकों घर आने को कहती थी। लेकिन यमराज अपने कामों में ज्यादा व्यस्त होने के कारण अपनी बहन के पास नहीं जा पाते थे, लेकिन एक बार कार्तिक शुक्ल के दिन यमुना ने अपने भाई के घर आने के लिए निमंत्रण भेजा और उन्हें वचनबद्ध कर दिया। यमराज ने उनकी बात मानते हुए, अपनी बहन के पास आने का बादा किया लेकिन बहन के घर जाने से पहले उन्होंने सभी जीवों को नरक से मुक्त कर दिया।

इसके बाद यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहंचे, जिन्हें देख उनकी बहन यमुना का खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। उस दिन उनकी बहन ने अपने भाई का बड़ी धूमधाम से स्वागत किया और टिका चंदन लगाकर भाई की आरती उतारी साथ ही कई तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाकर खिलाया।

यमराज अपनी बहन की इस प्रेम भक्ति को देख कर बडे़ प्रसन्न हुए और अपनी बहन को तोफे में कुछ मांगने को कहा बहन यमुना ने अपने भाई से तोफे में  आप हर साल इसी दिन मेरे घर आया करो और इस दिन जो भी बहन अपने भाई का आदर सत्कार करेगी, उसे कभी भी आपका भय ना रहे। यमराज ने उनकी बात मान ली  और वहां से विदा ले लिया । तब आज तक यह त्यौहार बड़े धूम धाम से मानाया जाता है।
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भैया दूज को मानाने की विधि-


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सबसे पहले बहन सुबह उठकर स्नान करती है। और उसके बाद पूजा पाठ करती है। सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।उसके बाद भाई को रोली चंदन का टीका लगाकर चावल तेल  के बने चूडे़ चड़ाती है। और अनेक प्रकार के भोजन बनाकर भाई को खिलाती है।
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