घुघुतिया त्यौहार का महत्व एवम् लोककथा ! (क्योँ मनाया जाता हैं घुघुतिया का त्यौहार)

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घुघुतिया त्यौहार उत्तराखंड

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड में त्यौहार के रूप में मनाये जाने वाला “घुघुतिया त्यौहार” के बारे में जानकारी देने वाले है | यदि आप “घुघुतिया त्यौहार” के बारे में जानकारी पाना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

उत्तराखंड की कुमाउं संस्कृति में मनाये जाने वाला “घी त्यौहार” के बारे में जानकारी पाने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे |




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घुघुतिया त्यौहार उत्तराखंड उत्तराखंड राज्य के कुमाउं में मकर सक्रांति पर “घुघुतिया” के नाम से त्यौहार मनाया जाता है | यह कुमाऊँ का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है और यह एक स्थानीय पर्व होने के साथ साथ स्थानीय लोक उत्सव भी है क्योंकि इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन घुघुत बनाया जाता है | इस त्यौहार की अपनी अलग पहचान है | इस त्यौहार को उत्तराखंड में “उत्तरायणी” के नाम से मनाया जाता है एवम् गढ़वाल में इसे पूर्वी उत्तरप्रदेश की तरह “खिचड़ी सक्रांति” के नाम से मनाया जाता है | विश्व में पशु पक्षियों से सम्बंधित कई त्योहार मनाये जाते हैं पर कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का यह अनोखा त्यौहार उत्तराखण्ड के कुमाऊँ के अलावा शायद कहीं नहीं मनाया जाता है | यह त्यौहार विशेष कर बच्चो और कौओ के लिए बना है | इस त्यौहार के दिन सभी बच्चे सुबह सुबह उठकर कौओ को बुलाकर कई तरह के पकवान खिलाते है और कहते है :-

“काले कौओ काले घुघुती बड़ा खाले ,
लै कौआ बड़ा , आपु सबुनी के दिए सुनक ठुल ठुल घड़ा ,
रखिये सबुने कै निरोग , सुख समृधि दिए रोज रोज |”

इसका अर्थ है काले कौआ आकर घुघुती(इस दिन के लिए बनाया गया पकवान) , बड़ा (उरद का बना हुए पकवान) खाले , ले कौव्वे खाने को बड़ा ले और सभी को सोने के बड़े बड़े घड़े दे , सभी लोगो को स्वस्थ रख और समृधि दे |
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घुघुतिया त्यौहार मनाने के पीछे एक लोकप्रिय लोककथा है | यह लोककथा कुछ इस प्रकार है | जब कुमाउं में चन्द्र वंश के राजा राज करते थे , तो उस समय राजा
कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी, संतान ना होने के कारण उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था | उनका मंत्री सोचता था कि राजा के मरने के बाद राज्य उसे ही मिलेगा | एक बार राजा कल्याण चंद अपनी पत्नी के साथ बागनाथ मंदिर  के दर्शन के लिए गए और संतान प्राप्ति के लिए मनोकामना करी और कुछ समय बाद राजा कल्याण चंद को संतान का सुख प्राप्त हो गया , जिसका नाम “निर्भय चंद” पडा | राजा की पत्नी अपने पुत्र को प्यार से “घुघती” के नाम से पुकारा करती थी और  अपने पुत्र के गले में “मोती की माला” बांधकर रखती थी | मोती की माला से निर्भय का विशेष लगाव हो गया था इसलिए उनका पुत्र जब कभी भी किसी वस्तु की हठ करता तो रानी अपने पुत्र निर्भय को यह कहती थी कि “हठ ना कर नहीं तो तेरी माला कौओ को दे दूंगी” | उसको डराने के लिए रानी “काले कौआ काले घुघुती माला खाले” बोलकर डराती थी | ऐसा करने से कौऐ आ जाते थे और रानी कौओ को खाने के लिए कुछ दे दिया करती थी | धीरे धीरे निर्भय और कौओ की दोस्ती हो गयी | दूसरी तरफ मंत्री घुघुती(निर्भय) को मार कर राज पाठ हडपने की उम्मीद लगाये रहता था ताकि उसे राजगद्दी प्राप्त हो सके |

एक दिन मंत्री ने अपने साथियो के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा | घुघुती (निर्भय) जब खेल रहा था तो मंत्री उसे चुप चाप उठा कर ले गया | जब मंत्री घुघुती (निर्भय) को जंगल की ओर ले जा रहा था तो एक कौए ने मंत्री और घुघुती(निर्भय) को देख लिया और जोर जोर से कॉव-कॉव करने लगा | यह शोर सुनकर घुघुती रोने लगा और अपनी मोती की माला को निकालकर लहराने लगा | उस कौवे ने वह माला घुघुती(निर्भय) से छीन ली | उस कौवे की आवाज़ को सुनकर उसके साथी कौवे भी इक्कठा हो गए एवम् मंत्री और उसके साथियो पर नुकली चोंचो से हमला कर दिया | हमले से घायल होकर मंत्री और उसके साथी मौका देख कर जंगल से भाग निकले |



राजमहल में सभी घुघुती(निर्भय) की अनूपस्थिति से परेशान थे | तभी एक कौवे  ने घुघुती(निर्भय) की मोती की माला रानी के सामने फेक दी | यह देख कर सभी को संदेह हुआ कि कौवे को घुघुती(निर्भय) के बारे में पता है इसलिए सभी कौवे के पीछे जंगल में जा पहुंचे और उन्हें पेड के निचे निर्भय दिखाई दिया | उसके बाद रानी ने अपने पुत्र को गले लगाया और राज महल ले गयी | जब राजा को यह पता चला कि उसके पुत्र को मारने के लिए मंत्री ने षड्यंत्र रचा है तो राजा ने मंत्री और उसके साथियों को मृत्यु दंड दे दिया | घुघुती के मिल जाने पर रानी ने बहुत सारे पकवान बनाये और घुघुती से कहा कि अपने दोस्त कौवो को भी बुलाकर खिला दे और यह कथा धीरे धीरे सारे कुमाउं में फैल गयी और इस त्यौहार ने बच्चो के त्यौहार का रूप ले लिया | तब से हर साल इस दिन धूम धाम से इस त्यौहार को मनाया जाता है | इस दिन मीठे आटे से जिसे “घुघुत” भी कहा जाता है | उसकी माला बनाकर बच्चों द्वारा कौवों को खिलाया जाता है |

शास्त्रों के अनुसार घुघुतिया त्यौहार की ऐसी मान्यता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते है इसलिए इस दिन को मकर सक्रांति के नाम से ही जाना जाता है |

महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपने देह त्याग ने के लिए मकर सक्रांति का ही दिन चुना था | यही नहीं यह भी कहा जाता है कि मकर सक्रांति के दिन
ही गंगाजी भागीरथी के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी | साथ ही साथ इस दिन से सूर्य उत्तरायण की ओर प्रस्थान करता है , उत्तर दिशा में देवताओं का वास भी माना जाता है इसलिए इस दिन जप-तप , दान-स्नान , श्राद्ध-तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है | (घुघुतिया त्यौहार)




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उम्मीद करते है कि आपको “घुघुतिया त्यौहार का महत्व एवम् लोककथा” के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |
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