History of Tehri Garhwal !! ( टिहरी गढ़वाल का इतिहास !! )

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टिहरी गढ़वाल का इतिहास

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में गढ़वाल मंडल के “History of Tehri Garhwal !! (टिहरी गढ़वाल का इतिहास)”  के बारे में पूरी जानकारी देने वाले है , यदि आप टिहरी गढ़वाल के इतिहास के बारे में जानना चाहते है , तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े |
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टिहरी गढ़वाल का इतिहास टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल मंडल का एक प्रसिद्ध एवम् लोकप्रिय जिला है | पर्वतों के बीच स्थित यह स्थान बहुत सौन्दर्य युक्त है। प्रति वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती काफी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है । तीन नदियों के संगम (भागीरथी, भिलंगना व घृत गंगा) या तीन छोर से नदी से घिरे होने के कारण इस जगह को त्रिहरी व फिर टीरी व टिहरी नाम से पुकारा जाने लगा । टिहरी गढ़वाल दो शब्दों से मिलकर बना है , जिसमे टिहरी शब्द “त्रिहरी” से बना है , इसका अर्थ है ऐसा स्थान जो तीन तरह के पाप (मनसा , वाचना , कर्मणा से ) मिटाने का काम करता है | वही “गढ़” का अर्थ है ‘किला’ , इसके पीछे का एक लम्बा इतिहास है | सन 888 से पूर्व सारा गढ़वाल छोटे-छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था , जिसमे अलग अलग राज्य के राजा राज करते थे , जिन्हें ‘राणा’ , ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था |

ऐसा कहा जाता है कि माल्वा के राजकुमार कनकपाल बद्रीनाथ धाम के दर्शन के लिए गए थे , वहां वे पराक्रमी राजा भानु प्रताप से मिले | राजकुमार कनकपाल ने राजा भानु प्रताप को काफी प्रभावित किया जिसकी वजह से राजा बहन प्रताप ने अपनी इकलौती बेटी का विवाह कनकपाल से करवा दिया और अपना सारा राज्य कनकपाल को सौप दिया | हलके हलके करके कनकपाल और उनकी आने वाली पीढ़ीयाँ एक एक कर सारे गढ़ जीत कर अपना राज्य बढाती गयी | इस तरह 1803 तक सारा गढ़वाल क्षेत्र इनके कब्जे में आ गया |

उन्‍ही सालों में गोरखाओं के नाकाम हमले (लंगूर गढ़ी को कब्‍जे में करने की कोशिश) भी होते रहे , लेकिन सन्‌ 1803 में आखिर देहरादून की एक लड़ाई में गोरखाओं की विजय हुई , जिसमें राजा प्रद्यमुन शाह मारे गये । लेकिन उनके शाहजादे (सुदर्शन शाह) जो उस वक्‍त छोटे थे वफादारों के हाथों बचा लिये गये । धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्‍व बढ़ता गया और उन्होंने करीब 12 साल तक राज्‍य किया । इनका राज्‍य कांगड़ा तक फैला हुआ था , फिर गोरखाओं को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से निकाल बाहर किया और दूसरी तरफ सुदर्शन शाह ने ईस्ट इंडिया कम्‍पनी की मदद से गोरखाओं से अपना राज्‍य वापस छीन लिया ।

ईस्ट इंडिया कम्‍पनी ने कुमाऊ , देहरादून और पूर्व (ईस्ट) गढ़वाल को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दिया और पश्चिम गढ़वाल को राजा सुदर्शन शाह को दे दिता , जिसे अब टिहरी रियासत के नाम से जाना गया |

राजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी “टिहरी या टेहरी” शहर को बनाया और बाद में उनके उत्तराधिकारी प्रताप शाह , कीर्ति शाह और नरेन्द्र शाह ने इस राज्य की राजधानी प्रताप नगर , कीर्ति नगर और नरेन्द्र नगर स्थापित की और तीनो उत्तराधिकारी ने 1815 से सन 1949 तक राज्य किया | इस क्षेत्र के लोगों ने भारत छोडो आन्दोलन के खिलाफ अत्यधिक हिस्सा लिया | आज़ादी के बाद लोगों के मन में राजाओं के शासन से मुक्त होने की इच्छा होने लगी एवम् अंत में राजा मानवेन्द्र शाह ने भारत के साथ एक हों जाना कबूल कर लिया | इस तरह सन 1949 में टिहरी राज्य को उत्तरप्रदेश में मिलकर एक जिला बना दिया गया | बाद में 24 फरवरी 1960 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसकी एक तहसील को अलग कर उत्तरकाशी नाम का एक और जिला बना दिया |
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Pauri Garhwal , Uttarakhand !!
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