उत्तराखंड का इतिहास History Of Uttarakhand…

0
993
uttarakhand

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]

[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

उत्तराखंड का इतिहास History Of Uttarakhand

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में “उत्तराखंड का इतिहास History Of Uttarakhand” के बारे में बताने वाले हैं यदि आप “उत्तराखंड का इतिहास History Of Uttarakhand” के बारे में जानना चाहते हैं तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े
[/av_textblock]

[/av_one_full][av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_image src=’http://www.uttarakhanddarshan.in/wp-content/uploads/2019/03/uttarakhand.png’ attachment=’5292′ attachment_size=’full’ align=’center’ styling=’no-styling’ hover=’av-hover-grow’ link=” target=” caption=” font_size=” appearance=” overlay_opacity=’0.4′ overlay_color=’#000000′ overlay_text_color=’#ffffff’ animation=’no-animation’ admin_preview_bg=”][/av_image]

[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

उत्तराखंड का इतिहास History Of Uttarakhand

उत्तराखंड का शाब्दिक अर्थ उत्तरी भू-भाग का रूपांतर हैं| इस नाम का उल्लेख प्रारम्भिक हिन्दू ग्रन्थों से मिलता हैं, जहाँ कुमाऊँ को मानसखंड तथा गढ़वाल को केदारखंड के नाम से जाना जाता हैं |उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता हैं, क्योंकि यह क्षेत्र धर्मस्थल और देवीशाक्तियों  की भूमि मानी जाती हैं , उत्तराखंड में पारव,कुषाण ,गुप्त ,कत्यूरी, पाल, चंद व् पवांर राजवंश और अंग्रेजों ने बारी- बारी  से शासन किया था|

आधिकारिक तौर पर उत्तराखंड राज्य, जिसे पहले उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था, भारत के उत्तरी हिस्से में एक राज्य है। इसे अक्सर देवभूमि(शाब्दिक रूप से “देवताओं की भूमि”) के रूप में जाना जाता है| पूरे राज्य में बड़ी संख्या में हिंदू मंदिरों और तीर्थ केंद्रों के कारण। उत्तराखंड हिमालय, भाभार और तेराई के प्राकृतिक पर्यावरण के लिए जाना जाता है।
[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

पौराणिक इतिहास  के अनुसार –

पौराणिक ग्रन्थों में कुर्मांचल क्षेत्र मानसखंड के नाम से प्रसिद्ध था| पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरी हिमालय में सिद्ध गन्धर्व,यक्ष,किन्नर,जातियों की सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं कुबेर की राजधानी अलकापुरी (बद्रीनाथ से ऊपर) बताई जाती हैं| पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के आश्रम में ऋषि मुनि तप व् साधना करते थे| अंग्रेज इतिहासकरों के अनुसार हुण,शक,नाग,खस,आदि जातियां भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी| पौराणिक ग्रंथो में केदार खंड व् मानस खंड के नाम से इस क्षेत्र का ब्यापक उल्लेख हैं|इस क्षेत्र को देवभूमि व् तपोभूमि माना जाता हैं|


(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});

मानस खंड का कुर्मांचल व् कुमाऊँ नाम चन्द राजाओ के शासन काल से प्रचलित हुई कुमाऊँ पर चंद राजाओं का शासन कत्यूरियो के बाद प्रारम्भ होकर सन 1790 तक रहा| सन 1790 में नेपाल की  गोरखा सेना ने कुमाऊँ पर आक्रमण कर कुमाऊँ  राज्य को अपने अधीन कर लिया| गोरखाओं का कुमाऊँ पर सन 1790 से 1815 तक शासन रहा|सन 1815 में अंग्रेजों से अंतिम बार परास्त होने के उपरांत गोरखा सेना वापस चली गयी किन्तु अंग्रेजों ने कुमाऊँ का शासन चंद राजाओ को न दे कर ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन कर लिया इस प्रकार कुमाऊँ पर 1815 शासन चला |

[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

कुमाऊँ का इतिहास

कुमाऊँ के समाजशास्त्रीय क्षेत्र का नाम “कूर्मांचल” से लिया गया है, जिसका अर्थ है कूर्मावतार भूमि (भगवान विष्णु का कछुआ अवतार)।

1300 से 1400 ई। के बीच के प्राचीन काल में, उत्तराखंड के कत्युरी राज्य के विघटन के बाद, उत्तराखंड का पूर्वी क्षेत्र (कुमाऊं और नेपाल का सुदूर-पश्चिमी क्षेत्र जो तब उत्तराखंड का एक हिस्सा था) आठ अलग-अलग रियासतों यानी बैजनाथ से विभाजित था -कत्युरी, द्वारहाट, दोती, बारामंडल, असकोट, सिरा, सोरा, सुई (काली कुमाऊँ)। बाद में, 1581 ई। में रुद्र चंद के हाथ से राइका हरि मल्ल (रुद्र चंद के मामा) की हार के बाद, ये सभी विघटित हिस्से राजा रुद्र चंद के अधीन आ गए और पूरा क्षेत्र कुमाऊँ के रूप में था।
[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

गढ़वाल का इतिहास


(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});


भारतवर्ष का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की गढ़वाल के हिमालय क्षेत्र का है |

पौराणिक शासन “पौड़ी गढ़वाल” का :-

दस्तावेज के अनुसार पौराणिक काल में पुरे भारतवर्ष में रजवाड़े निवास करते थे | और उनके राजा राज्य में राज करते थे |

इसी प्रकार सबसे पहले उत्तराखंड के पहाड़ो में सबसे पहले राजवंश “कत्युरी” था |

जिन्होंने अखंड उत्तराखंड पर शासन किया और शिलालेख और मंदिरों के रूप में कुछ महत्वपूर्ण निशान छोड़ गए । कत्युरी के पतन के बाद के समय में, यह माना जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र एक सरदार द्वारा संचालित साठ से अधिक चार राजवंशों में विखंडित था |एक प्रमुख सेनापति चंद्रपुरगढ़ क्षेत्र के थे ।

15 वीं शताब्दी के मध्य में :- चंद्रपुरगढ़ के राजा जगतपाल (1455 से 14 9 3) के शासन के अंतर्गत एक शक्तिशाली शासन के रूप में उभरा , जो कनकपाल के वंशज थे । 15 वीं शताब्दी के अंत में राजा अजयपाल ने चंद्रपुरगढ़ का शासन किया और इस क्षेत्र पर शासन किया। इसके बाद, उसके राज्य को गढ़वाल के रूप में जाना जाने लगा और उन्होंने 1506 ई से पहले चंद्रगढ़ से देवलागढ़ तक अपनी राजधानी और 1506 से 1519 के बीच श्रीनगर को स्थानांतरित कर दिया।

राजा अजयपाल और उनके उत्तराधिकारियों ने लगभग तीन सौ साल तक गढ़वाल के क्षेत्र पर शासन किया था | इस अवधि के दौरान उन्होंने कुमाऊं, मुगल, सिख और रोहिल्ला से कई हमलों का सामना किया था।
[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

उत्तराखंड की संस्कृति

प्राकृतिक विविधता एवं हिमालय का अद्वितीय सौंदर्य व् पवित्रता  ‘उत्तराखंड की संस्कृति’ में एक नया आयाम जोड़ देते हैं।यहाँ के लोग और यहाँ की संस्कृति में भी उत्तराखंड के विविध भू दृश्य की विविधता के दर्शन होते है। उत्तराखंड की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा की जड़े मुख्य रूप से धर्म से जुड़ी हुईं हैं। संगीत ,नृत्य एवं कला यहाँ की संस्कृति को हिमालय से जोड़ती है।
उत्तराखंड की नृत्य शैली जीवन और मानव अस्तित्व से जुडी है और असंख्य मानवीय भावनाओं को प्रदर्शित करती है। “लंगविर” यहाँ की एक पुरुष नृत्य शैली है जो शारीरिक व्यायाम से प्रेरित है। “बराड़ा” देहरादून क्षेत्र का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है, कुछ विशेष धार्मिक त्योहारों के दौरान किया जाता है। इनके अलावा हुरका बोल,झोरा-चांचरी,झुमैला,चौफुला और छोलिया आदि यहाँ के जाने माने नृत्य हैं।
संगीत उत्तराखण्ड की संस्कृति का एक अभिन्न अंग  है। मंगल,बसन्ती ,खुदेड़ आदि यहाँ के लोकप्रिय लोकगीत है।


(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});


[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]

उत्तराखंड की भाषा 

उत्तराखंड में बोली जाने वाली ,गढ़वाली तथा  कुमाऊँनी दो मुख्य क्षेत्रीय भाषाएँ हैं, लेकिन सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है। कुमाऊँनी और गढ़वाली बोलियां, गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में बोली जाती हैं। पश्चिम और उत्तर में कुछ आदिवासी समुदायों में जौनसारी और भोटिया बोलियां बोलते हैं। दूसरी ओर, शहरी आबादी में ज्यादातर हिंदी, जो संस्कृत के साथ साथ उत्तराखंड के एक आधिकारिक भाषा है|
[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_one_full first min_height=” vertical_alignment=” space=” custom_margin=” margin=’0px’ padding=’0px’ border=” border_color=” radius=’0px’ background_color=” src=” background_position=’top left’ background_repeat=’no-repeat’ animation=” mobile_display=”]
[av_textblock size=” font_color=” color=” admin_preview_bg=”]
उमीद करते हैं आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया तो इसे like तथा नीचे दिए बटनों द्वारा share जरुर करें|
[/av_textblock]
[/av_one_full]

[av_social_share title=’Share this entry’ style=’minimal’ buttons=’custom’ share_facebook=’aviaTBshare_facebook’ share_twitter=’aviaTBshare_twitter’ share_gplus=’aviaTBshare_gplus’ admin_preview_bg=”]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here