जौलजीबी का मेला , पिथौरागढ़ !! (Jauljibi Mela , Pithoragarh)

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जौलजीबी का मेला

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन कि इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध मेला “जौलजीबी मेला” के बारे में जानकारी देने वाले है , इसलिए इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े |

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jauljibi ka melaपिथौरागढ़ नगर से 68 किमी की दूरी पर स्थित “जौलजीबी” एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह स्थान गोरी और काली नामक दो नदियों का संगम स्थल होने के कारण प्रसिद्ध है । इसके अलावा इसी संगम स्थल पर प्रतिवर्ष एक प्रसिद्ध मेला “जौलजीबी का मेला” आयोजित किया जाता है , जो पूरे भारत और नेपाल के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है । जौलजीबी का मेला भारत नेपाल के साझी संस्कृति का एक ऐतिहासिक प्रतीक है | मेला मकर संक्रान्ति के शुभ अवसर पर आयोजित किया जाता है । जौलजीबी से 10 किमी की दूरी पर एक अन्य पर्यटक आकर्षण “कालापानी की पहाड़ी” है , जहाँ एक गर्म पानी का स्रोत है, जिसे औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है ।

अभिलेखों के अनुसार, इस मेले का आयोजन पहली बार 1 नवंबर,1914 को हुआ था | प्रसिद्ध जौलजीबी के मेले को प्रतिवर्ष 14 नवम्बर”बाल दिवस” के अवसर पर आयोजन किया जाता है | जौलजीबी के मेले को प्रारंभ या आयोजित करने का सर्वप्रथम सारा श्रेय पाल ताल्लुकदार स्व. गजेंद्रबहादुर पाल को जाता है , जो कि अस्कोट के ताल्लुकदार थे | उन्होंने इस मेले को 1914 में आरम्भ किया था , हालांकि उस समय यह मेला धार्मिक रूप से आयोजित हुआ था लेकिन धीरे धीरे इस मेले का मुख्य रूप व्यवसायिक बन गया | जौलजीबी में काली-गोरी नदी का संगम स्थल और शिव का प्राचीन मंदिर स्थित है |

स्कन्दपुराण के अनुसार मानसरोवर जाने वाले यात्री को काली-गोरी नदी के संगम पर स्नानकर आगे बढ़ना चाहिए इसलिए मार्गशीर्ष महीने की संक्रान्ति को मेले का शुभारम्भ भी संगम पर स्नान से ही होता है | चीनी आक्रमण से पहले यह मेला उत्तरभारत का सबसे प्रसिद्ध मेला था | इस मेले में तिब्बत और नेपाल के व्यापारी बिलकुल सामान रूप से भागीदार होते थे | इस मेले में नेपाल से शहद और घी प्रमुख रूप से लाया जाता था। भारतीय क्षेत्र से धारचूला-मुनस्यारी तहसीलों के ‘भोटिया’ वर्ग के व्यापारी ऊनी वस्त्र जैसे- कालीन, चुटका, थुलमा, ऊनी पॅखी आदि बेचने हेतु मेले में लाते थे। तराई-भाबर से आने वाले व्यापारी वर्ग काष्ठ यन्त्र हल, जुआ, ठेकी आदि लाते थे | जौलजीबी का यह मेला चीनी आक्रमण के बाद सबसे अधिक प्रभावित हुआ जिसके कारण तिब्बत का सामान आना बंद हो गया और ऊनि व्यापार पर इसका उल्टा प्रभाव पड़ने लगा |

इस मेले से हमारी संस्कृति , रीति-रिवाज़ व परम्पराओ आदि से नयी पीढ़ी को ज्ञान प्राप्त होता है | जौलजीबी के मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम , लोक नृत्य एवम् कुमाउनी गीतों  की प्रस्तुति मेले में समा बांध देती है |

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जौलजीबी मेले के अलावा पिथौरागढ़ में थल मेला भी बड़ी धूम के साथ मनाया जाता है यदि आप थल मेले के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो निचे दिए गए लिंक में क्लिक कर पोस्ट को जरुर पढ़े |
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पिथौरागढ़ जिले के प्रसिद्ध मंदिर पाताल भुवनेश्वर मंदिर” , “मोस्तामानू मंदिर और कामाक्ष्य/कामख्या देवी मंदिर के बारे में जानने के लिए निचे दिए लिंक में क्लिक करे !
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