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उत्तरखंड में महकेगा तेजपत्ता बढेगा रोजगार Tej patta plant (Uttarakhand)…

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उत्तरखंड में महकेगा तेजपत्ता बढेगा रोजगार Tej patta plant

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में उत्तराखंड में पाया जाने वाला “तेजपत्ता Tej Patta Plant” के बारे में बताने वाले हैं यदि आप जानना चाहते हैं उत्तराखंड में पाया जाने वाला “तेजपत्ता Tej Patta Plant” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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उत्तरखंड में महकेगा तेजपत्ता Tej patta plant

तेजपत्ते का इस्तेमाल ज्यादातर भारतीय पकवानों में किया जाता है. मसाले के तौर पर इस्तेामल होने वाली इन पत्त‍ियों में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं. इनसे तेल भी निकाला जाता है. तेजपत्ते में भरपूर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट पाया जाता है.इसके अलावा इन पत्तियों में कई तरह के प्रमुख लवण जैसे कॉपर, पोटैशियम, कैल्शियम, गैगनीज,सेलेनियम और आयरन पाया जाता है.


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उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में सरोवर नगरी के साथ ही तेजपत्ता उत्पादन के मामले में मुख्य उत्पादक क्षेत्र बनता जा रहा हैं| जिले के सात विकासखंडो में 3759 कृषक 250 हेक्टेयर क्षेत्रफल में तेजपत्ता की खेती कर रहे हैं| मसाला उद्योग में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किये जाने वाले तेजपत्ता उत्पादन में किसानों की रूचि को देखते हुए अब भीमताल व ओखलकांडा क्षेत्र में 17 अरोमा कलस्टर विकसित किये जाएंगे| इसके लिए 286 कृषको की 183 हेक्टेयर भूमि को तेजपात की खेती से आच्छादित करने के लिए चयन किया गया है| इससे क्षेत्र में तेजपत्ता उत्पादन का बाजार तैयार होगा, जिससे रोजगार के साधन बढ़ेगे|
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यहाँ बनेगे 17 अरोमा कलस्टर

विकासखंड भीमताल के ग्राम मंगोली भेवा, नलनी, जलालगाँव, खामारी, सूर्यागाँव, दोगड़ा, जन्तवाल,चोपडा,भाल्यूटी, हैडाखान, बडैत, स्युडा और ओखलकांडा ब्लाक के भदरेठा, मटेला, पुटपुडी, अडगांव तल्ला, साल, भनपोखरा, डालकन्या देवली, भद्र्कोट एवं तुषराड सहित अन्य गाँवों में 17 अरोमा कलस्टर विकसित किये जाएगे| इन कलस्टरों में चयनित कृषकों को जैविक खेती करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ कर दिए गये हैं योजना के तहत कृषकों को जैविक खाद एवं उवर्रक, वर्मी कम्पोस्ट पिट और स्प्रे मशीन निश्शुल्क वितरित की जाएगी|


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तेजपत्ता का क्या हैं उपयोग

तेजपत्ता की पत्ती व छाल दोनों का उपयोग किया जाता हैं| पत्तियों की सबसे अधिक खपत मसाला उद्योग में होती हैं पत्तियों का सीधे मसाले के रूप म प्रयोग होता हैं और पत्तियों से मिलाने वाले सुगंधित तेल का सौन्दर्य प्रसाधन में इस्तेमाल होता हैं


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प्रतिवर्ष 30 क्विंटल पत्तियों का उत्पादन

पौधरोपण करने के पांच साल बाद तेजपात का लाभ मिलाना शुरू हो जाता हैं| एक हेक्टेयर श्रेत्रफल में ही प्रतिवर्ष तकरीबन 30 क्विंटल पत्तियों का उतपादन होता हैं जिससे किसानो को प्रति हेक्टेयर 1.50 लाख की आय होती है
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तेजपत्ता का प्रदेश में उत्पादन

प्रदेश में लगभग 6200 किसान इस उत्पादन से जुड़े हैं, जो 365 हेक्टेयर क्षेत्रफल में तेजपात की खेती कर रहे हैं इससे 900 टन पत्तियों का उत्पादन प्रतिवर्ष हो रहा हैं|

वैज्ञानिक प्रभारी नृपेंद्र चौहान, का कहना है कि सगंध पौध केंद्र ने परंपरागत कृष विकास योजना के अंतर्गत नैनीताल के भीमताल व ओखलकांडा ब्लाक के गांवो का चयन किया हैं उत्तराखंड में उत्पादित तेजपत्ता अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण अन्य राज्यों के तेजपात से भिन्न हैं इसकी अन्य राज्यों में भी मांग हैं|


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तेजपत्ता के फायदे Benefits of Tej patta

तेजपत्ता डायबिटीज  के प्रभावों को दूर-

आयुर्वेद के अनुसार तेज पत्‍तों का उपयोग कर डायबिटीज  का उपचार किया जा सकता है। क्‍योंकि यह    रक्‍त ग्‍लूकोज, कोलेस्‍ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड के स्‍तर को कम करने में मदद करते हैं। और अधिक लाभ प्राप्‍त करने के लिए आप इन पत्‍तों का पाउडर भी बना सकते हैं


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तेजपत्ता कैंसर के प्रभावों को दूर-

कैंसर प्रभावों को दूर करने के लिए तेज पत्‍ता बहुत ही उपयोगी होता है। क्‍योंकि इसमें एंटी-कैंसर  गुण होते हैं। तेज पत्‍ते में कैफीक एसिड, कार्सेटिन, यूगानोल और कैचिन होते हैं जिनमें केमो- सुरक्षात्‍मक गुण होते हैं जो विभिन्‍न प्रकार के कैंसर को रोकने में मदद करते हैं।
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टिम्मरसैंण ‘बाबा बर्फानी चमोली’ गढ़वाल Timmersain Baba Barfani Chamoli Garhwal (Uttarakhand)…

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टिम्मरसैंण बाबा बर्फानी चमोली गढ़वाल Timmersain Mahadev Baba Barfani Chamoli Garhwal

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में “टिम्मरसैंण बाबा बर्फानी चमोली गढ़वाल Timmersain Mahadev Baba Barfani” के बारे में बताने वाले है यदि आप जानना चाहते “टिम्मरसैंण बाबा बर्फानी चमोली गढ़वाल Timmersain Mahadev Baba Barfani” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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टिम्मरसैंण महादेव भगवान (बाबा बर्फानी )का इतिहास History Of Timmersain Mahadev Chamoli Garhwal 

टिम्मरसैंण महादेव भगवान शिव की एक गुफा है जो उत्तराखंड के चमोली जिले के नीती गांव में स्थित है। यह गुफा जम्मू और कश्मीर के अमरनाथ मंदिर की तरह प्राकृतिक रूप से प्रसिद्ध है। क्योंकि यहाँ बर्फ का एक प्राकृतिक शिवलिंग है, इस स्थान को दिन प्रतिदिन लोकप्रियता मिल रही है।

सर्दियों के मौसम में, चमोली की टिम्मरसैंण महादेव की इस आध्यात्मिक गुफा में एक प्राकृतिक शिवलिंग बनता है। यह गाँव भारत-चीन सीमा पर बर्फ से ढकी गढ़वाल हिमालय की गोद में बसा है। इस स्थान पर जाने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है। शिवलिंग लगभग जम्मू की अमरनाथ गुफा के शिवलिंग जैसा दिखता है। चमोली गढ़वाल के नीती – क्षेत्र में महादेव गुफा एक बहुत ही पवित्र स्थान है। यहाँ स्थानीय निवासी भगवान शिव लिंग के दर्शन करने आते हैं और गर्मी के मौसम में भगवान शिव को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।


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हालांकि, उत्तराखंड पर्यटन विभाग फरवरी के महीने से यात्रियों और तीर्थयात्रियों को इस जगह जाने की अनुमति दे दी है, लेकिन इस  मौसम में अत्यधिक बर्फबारी होने के कारण वहां तक ​​पहुंचना मुश्किल हो सकता है। 2019 में यहाँ वसंत पंचमी के समय 10 फरवरी के लिए यात्रा निर्धारित की गई थी, लेकिन अब इसे मार्च के पहले सप्ताह तक के लिए स्थगित कर दिया गया है।

इस साल टिम्मरसैंण महादेव का पहला जत्था 29 अप्रैल को पहुंचा था। जोशीमठ के नीती गांव में नंदा देवी मंदिर में एक छोटी पूजा के बाद लगभग 400 तीर्थयात्री इस स्थल पर जाते हैं। आप यहाँ ग्रीष्मकाल में इस तीर्थस्थल के दर्शन कर सकते हैं|
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टिम्मरसैंण बाबा बर्फानी चमोली गढ़वाल के बारे में

About Timmersain Mahadev Chamoli Garhwal

बाबा बर्फानी की ये गुफा चमोली गढ़वाल के अंतिम गांव नीती से 7सौ मीटर की दूरी पर मौजूद है। इस जगह को टिम्मरसैंण कहते हैं, जहां सर्दी के मौसम में बर्फ का शिवलिंग बनता है। जिस स्थान पर बर्फ का शिवलिंग दिखाई देता है, उसे स्थानीय लोग बबूक उडियार के नाम से जानते हैं। इस पर पहाड़ी से टपकने वाले जल से हमेशा अभिषेक होता रहता है। इसी शिवलिंग के पास बर्फ पिघलने के दौरान प्रतिवर्ष बर्फ का एक शिवलिंग आकार लेता है। अमरनाथ गुफा में बनने वाले शिवलिंग की तरह इस शिवलिंग की ऊंचाई ढाई से तीन फीट के बीच होती है। स्थानीय लोग इसे बर्फानी बाबा के नाम से जानते हैं।


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इस जगह पहुंचने के लिए सेना की अनुमति लेनी पड़ती है। अपर आयुक्त गढ़वाल मंडल हरक सिंह रावत ने भी यहां अमरनाथ की तर्ज पर यात्रा शुरू करने का सुझाव दिया था। इसी कड़ी में शासन ने आगामी दस फरवरी से यात्रा शुरू करने का निर्णय लिया है। अपर आयुक्त गढ़वाल मंडल ने इस संबंध में सचिव पर्यटन की तरफ से जरूरी दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।
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यहाँ तक कैसे पहुंचे How To Reach?

यहाँ तक आप आसानी से पहुँच सकते हैं|

हवाई अड्डा – निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा हैं यहाँ से टिम्मरसैंण बाबा बर्फानी चमोली गढ़वाल की दूरी लगभग 354 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा कार से जा सकते हैं|

ट्रेन – निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश रेलवे स्टेशन है यहाँ से टिम्मरसैंण बाबा बर्फानी चमोली गढ़वाल की दूरी लगभग 332 किलोमीटर है यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा बस से जा सकते हैं|

सड़क से-

टिम्मर्सैन महादेव गुफा उत्तराखंड में चमोली जिले के अंतिम सीमा गाँव में स्थित है जो जोशीमठ से लगभग 82 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह उत्तराखंड की सड़कों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ शहर है। जोशीमठ में बुकिंग के लिए शॉर्ब कैब या वाहन उपलब्ध हैं। गुफा नीती गाँव से लगभग एक किलोमीटर पहले है और मुख्य सड़क से लगभग 700 मीटर पैदल / ट्रेकिंग दूरी पर स्थित है।
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Google Map Of Timmersain mahadev Chamoli Garhwal (Niti Pass)


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सातूं-आठू का त्यौहार क्यों मनाया जाता है? ( गौरा – महेश पूजा ) उत्तराखंड “Uttarakhand Festival”…

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सातूं-आठू त्यौहार (गौरा – महेश पूजा) “Uttarakhand Festival”

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में उत्तराखंड में मनाई जाने वाली “लोकप्रिय त्यौहार सातूं-आठू ( गौरा महेश पूजा) Uttarakhand Festival” के बारे में बाते वाले हैं यदि आप जानना चाहते हैं “सातूं-आठू पूजा Uttarakhand Festival” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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सातूं-आठू का त्यौहार क्यों मनाया जाता है? (गौरा – महेश पूजा) Uttarakhand Festival

देवभूमि में कई ऐसे एतिहासिक पर्व मनाये जाते हैं उनमे से सबसे खास यूं कहे सबसे लोकप्रिय त्यौहार सातूं-आठू (गौरा – महेश पूजा ) मनाई जाती हैं| यह पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं यह पर्व (भादौ) भाद्रमाह के सप्तमी – अष्ठमी को मनाया जाता हैं कहा जाता है कि सप्तमी को माँ गौरा  अपने मायके से रूठ कर मायके आती हैं तथा उन्हें लेने अष्टमी को भगवान महेश, आते हैं

गांव के सभी लोग सप्तमी अष्ठमी को माँ गौरा और भगवान महेश की पूजा करते हैं सप्तमी को माँ गौरा व्  अष्टमी को भगवान महेश की मूर्ति बनाई जाती है इस मूर्ति में धतूरा,मक्का,तिल व बाजरा का पौधा लगा के उनको सुन्दर वस्त्र पहनाएं जाते हैं| सप्तमी की रात को सभी महिलाएं विधि अनुसार पूजा करती हैं तथा भजन कीर्तन करती हैं|  साथ ही झोड़ा चाचरी (नाच, गाना)  के साथ इस पर्व को बेहद हर्षोल्लास से मानते हैं| महिलाए  सातूं-आठू पूजा में दो दिन व्रत (उपवास) रखती हैं| आठो (अष्ठमी) की सुबह भगवान महेश तथा माँ गौरा को बिरुड चढ़ाए जाते हैं| तथा महिलाएं सुन्दर गीत गाते हुए माँ गौरा को विदा करती हैं और माँ गौरा भगवान महेश की मूर्ति को स्थानीय मंदिर में विसर्जित किया जाता हैं माँ गौरा को (गवरा दीदी)भगवान महेश को (जीजाजी) भी कहा जाता है|


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सातूं-आठू बिरुड पंचमी के बारे में  

सातूं-आठू पर्व से पहले भादौ महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी को बिरुड़ पंचमी के नाम से जाना जाता है| इसी दिन से सातूं-आठू पर्व की धूम मचने लगती है। इस दिन गाँव-घरों में एक तांबे के बर्तन को साफ करके धोने के बाद इस पर गाय के गोबर से पाँच आकृतियाँ बनाई जाती हैं और उन पर दुब घास लगाई जाती है और इनपर अछ्त पीठाँ (टीका) लगा कर उस बर्तन में पाँच या सात प्रकार के अनाज के बीजों को भिगाया जाता है इन बीजों में मुख्यतया गेहूं, चना, भट्ट, मास, कल्यूं, मटर, गहत आदि होते हैं। पंचमी को भीगा ने के बाद सातों के दिन इन्हें पानी के धारे पर ले जाकर धोया जाता है जहां पर पाँच या सात पत्तों में इन्हें रखकर भगवान को भी चड़ाया जाता है। फिर आठों के दिन इन्हें गौरा-महेश को चड़ा कर व्रत टूटने के बाद में इसको प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। और सभी बड़े, बुजुर्ग, बच्चे एक दूसरे का बिरुड चढ़ाते है और आशीर्वाद देते हैं| साम को इन्हें पकाया भी जाता है।


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सातूं-आठू विरूड़ाष्टमी की कथा

विरूड़ाष्टमी के दिन महिलायें गले में दुबड़ा (लाल धागा) धारण करती हैं पौराणिक कथाओं के अनुसार पुरातन काल में एक ब्राहमण था जिसका नाम बिणभाट था। उसके सात पुत्र व साथ बहुएं भी थी लेकिन इनमें से सारी बहुएं निसंतान थी। इस कारण वह बहुत दुखी था। एक बार वह भाद्रपद सप्तमी को अपने यजमानों के यहां से आ रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। नदी पार करते हुए उसकी नजर नदी में बहते हुए दाल के छिलकों में पड़ी| उसने ऊपर से आने वाले पानी की ओर देखा तब उसकी नजर एक महिला पर पड़ी जो नदी के किनारे कुछ धो रही थी| वह उस स्त्री के पास गया वहां जा के देखा वह स्त्री कोई और नहीं बल्कि स्वयं पार्वती थी, और कुछ दालों के दानों को धो रही थी। बिणभाट ने बड़ी सहजता से इसका कारण पूछा  तब उन्होंने बताया कि वह अगले दिन आ रही विरूड़ाष्टमी पूजा के विरूड़ों को धो रही है। तब बिणभाट ने इस पूजा की विधि तथा इसे मिलने वाले फल (आशीर्वाद) के बारे में जानने की इच्छा की तब माँ पार्वती ने इस व्रत का महत्व बताया| भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को महिलायें व्रत रख कर बिरूड़ों को गेहूँ, चना, मास, मटर, गहत पञ्च अनाज को उमा-महेश्वर का ध्यान करके घर के एक कोने में अखंड दीपक जलाकर तांबे के बर्तन में भिगा दिया जाता है। दो दिन तक भीगने के बाद तीसरे दिन सप्तमी को इन्हें धोकर साफ कर लिया जाता है। अष्टमी को व्रतोपवास करके इन्हें गौरा-महेश्वर को चढ़ाया जाता हैं| भाट ने घर आकर बड़ी बधु को यथाविधि बिरूड़ भिगाने को कहा। बहु ने ससुर के कहे अनुसार अगले दिन व्रत रखकर दीपक जलाया और पंच्च अनाजो को एकत्र कर उन्हें एक पात्र में डाला। जब वह उन्हें भिगो रही थी तो उसने एक चने का दाना मुंह में डाल लिया जिससे उसका व्रत भंग हो गया। इसी प्रकार छहों बहुओं का व्रत भी किसी न किसी कारण भंग हो गया।


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सातवीं वहु सीधी थी। उसे गाय-भैंसों को चराने के काम में लगाया था। उसे जंगल से बुलाकर बिरूड़े भिगोने को कहा गया। उसने दीपक जला बिरूड़े भिगोये। तीसरे दिन उसने विधि विधान के साथ सप्तमी को उन्हें अच्छी तरह से धोया| अष्टमी के दिन व्रत रखकर शाम को उनसे गौरा-महेश्वर की पूजा की। दूब की गांठों को डोरी में बांध दुबड़ा पहना और बिरूड़ों का प्रसाद ग्रहण किया। मां पार्वती के आशीर्वाद से दसवें माह उसकी कोख से पुत्र ने जन्म लिया। बिणभाट प्रसन्न हो गया। तभी से महिलाऐं संतति की कामना तथा उसके कल्याण के लिए आस्था के साथ इस व्रत को किया करती हैं।

उत्तराखंड में मनाये जाने वाले विशेष पर्वो के बारे में जानने के लिए नीचे दिए गए link पर click करें|

जन्माष्टमी का त्यौहार 

फूलदेई  छमादेई

बसंत पंचमी

भैयादूज का त्यौहार 

रक्षाबंधन  का त्यौहार
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श्री प्रकाशेश्वर महादेव (शिव मंदिर) Prakasheshwar Mahadev Temple Dehradun (Uttarakhand)…

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श्री प्रकाशेश्वर महादेव (शिव मंदिर) ‘Prakasheshwar Mahadev Temple’ Dehradun (Uttarakhand)

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में “श्री प्रकाशेश्वर महादेव Prakasheshwar Mahadev Temple” के बारे में बताने वाले हैं यदि आप जानना चाहते हैं “श्री प्रकाशेश्वर महादेव Prakasheshwar Mahadev Temple” के बारे मेतो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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श्री प्रकाशेश्वर महादेव (शिव मंदिर) के बारे में

 Prakasheshwar Mahadev Temple

श्री प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर हिंदू भगवान शिव का मंदिर है जो उत्तराखंड में देहरादूनमसूरी रोड पर स्थित है यह लोकप्रिय रूप से शिव मंदिर के रूप में जाना जाता है। इस शिव मंदिर में भगवान शिव का स्फटिक शिवलिंग है। देहरादून में कई शिव मंदिर हैं, लेकिन यह शिवमंदिर विशेष है इस मंदिर में हिंदू त्योहार शिवरात्रि और सावन के महीनों में भक्तों का तांता लगा रहता हैं|

यह प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। यह शिव मंदिर देहरादून के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां आप भगवान और देवी की कई तस्वीरें और मूर्तियां देख सकते हैं। हर रोज मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। शिवरात्रि और सावन के अवसर पर विशेष पूजाएँ आयोजित की जाती हैं।

श्रद्धालुओं के लिए प्रतिदिन भंडारे का आयोजन किया जाता है, जहां उन्हें प्रसाद वितरित किया जाता है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है  जहां भक्त भगवान को कोई दान नहीं दे सकते। यह स्थान बहुत ही शांत है जो मन को पूर्ण विश्राम और शांति देता है।


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प्रकाशेश्वर नाम के साथ भगवान शिव मंदिर

Prakasheshwar Mahadev Temple

‘प्रकाशेश्वर’ शब्द दो हिंदी शब्दों से मिलकर बना है  ‘प्रकाश’ और ‘ईश्वर’ का संयोजन है। भगवान शिव के हजारों नाम हैं जिनका उल्लेख शिव सहस्त्रनामावली में मिलता है। भगवान शिव के लिए शिव सहस्त्रनामावली में एक नाम है, ‘प्रक्षय’ जिसका अर्थ है ‘भगवान शिव ज्ञान का प्रकाश हैं’ इस मंदिर में कोई दान तथा पैसे नही चढ़ाये जाते हैं |

शिव मंदिर में भगवान शिव को चढ़ाने के लिए कोई मिठाई या प्रसाद की दुकानें नहीं हैं। आप सिर्फ शिव लिंग पर जल चढ़ा सकते हैं। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए कई बर्तन और पानी की सुविधा है। यहां आपको मुफ्त में स्वादिष्ट चाय और दैनिक विभिन्न प्रकार के प्रसाद जैसे हलवा, खीर, चना और पूड़ी मिलेगी। यहां भक्तों के लिए भंडारा (लंगर) भी होता है ताकि आप यहां मुफ्त भोजन भी प्राप्त कर सकें। भगवान शिव भक्तों के लिए प्रतिदिन भंडारे का आयोजन किया जाता है। यहां मुफ्त पवित्र नदी गंगा का पानी भी उपलब्ध है इसलिए आप इसे बिना किसी खर्च के प्राप्त कर सकते हैं।


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यहाँ तक कैसे पहुंचे How To Reach?

यहाँ तक आप आसानी से पहुँच सकते हैं|

हवाई अड्डा – निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा हैं यहाँ से श्री प्रकाशेश्वर महादेव (शिव मंदिर) की दूरी लगभग  39 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से कार में जा सकते हैं|

ट्रेन- निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून रेलवे स्टेशन हैं यहाँ से श्री प्रकाशेश्वर महादेव (शिव मंदिर) की दूरी लगभग 15 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से कार से जा सकते हैं|
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Google Map Of Prakasheshwar Mahadev Temple


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पीपल साहिब का इतिहास Peepal Sahib ‘Nanak Matta’ (Udham Singh Nagar)…

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इतिहास पीपल साहिब History Of “Peepal Sahib”

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में नानकमत्ता में स्थित “पीपल साहिब का इतिहास History Of Peepal Sahib” के बारे में बताने वाले हैं यदि आप जानना चाहते “पीपल साहिब History Of Peepal Sahib” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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इतिहास पीपल साहिब History Of Peepal Sahib

यह पीपल साहिब श्री गुरु नानक देव जी एवं श्री गुरु हरिगोविन्द साहिब जी की चरणछोह प्राप्त रहमतों का प्रतीक है| तीसरी उदासी के समय श्री गुरुनानक देव जी जब इस स्थान पर पहुंचे तो यह पीपल का वृक्ष सुखा हुआ था| श्री गुरुनानक देव जी की चरणछोह प्राप्त कर यह पीपल हरा भरा हो गया|

गुरु जी का यह अलौकिक किक चमत्कार देख के सिद्धों योगियों ने इश्यार्वश हो कर अपनी योग शक्ति से पीपल को हवा में उड़ा दिया|गुरु जी ने अपनी कृपा से उड़ते हुये पीपल को अपना पवित्र पंजा लगा के जमींन से 6-7 फुट ऊपर ही रोक दिया |

श्री गुरु नानक जी के चले जाने के बाद बाबा अलमस्त जी यहाँ की सेवा करने लगे| सिद्धों योगियों ने दुबारा यहाँ आके बाबा अलमस्त जी के साथ मार पीट कर के यहाँ खदेड़ दिया व अपनी योग शक्ति से पीपल को जला दिया उस समय श्री गुरु नानक देव जी की गद्दी पर श्री गुरु हरिगोविन्द साहिब विराजमान थे बाबा अलमस्त जी ने उनके चरणों में हाथ जोड़ के प्रार्थना की| गुरु जी ने अरदास परवान कर कुछ सिखों को अपने साथ लिया व श्री अमृतसर साहिब से यहाँ पहुंचे| गुरु जी का संत सिपाही रूप देख के सिद्ध डर कर भाग गये| गुरु जी ने में केसर नीला कर पीपल पर छीटे मारे| गुरु जी की कृपा से सुखा हुआ पीपल पुनह हरा भरा हो गया|


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इस स्थान के साथ गुरु जी के चरण छोह प्राप्त अन्य स्थान गुरु द्वार दूध वाला कुंवा, गुरु द्वार छेवी पात शाही  गुरु द्वार श्री भंडारा साहिब, बावउली  साहिब हैं| गुरु जी ने सिद्धों योगियों के साथ ज्ञान गोश्ठी की व उनके बाहरी आडम्बर व दिखावे का खंडन किया| गुरु जी ने उन्हें संसार में रहते हुये संसार से निर्लेप रह कर वाहि गुरु को पाने का उपदेश दिया| इस स्थान से धरती से आवाज आई,नानकमत्ता, नानकमत्ता, नानकमत्ता| इस लिए इस स्थान का नाम नानक मत्ता हैं|

देश देशान्तर से संगत आ कर इस पवित्र गुरु स्थान पर दर्शन व सेवा करते हैं| श्रधालुओं  की मनोकामनाए पूरी होती हैं|
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मान्यता पीपल साहिब

ऐसी मान्यता है कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव ने सन् 1515 में कैलाश पर्वत की यात्रा के दौरान नानकमत्ता का भी भ्रमण किया था । गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में एक पीपल का सुखा पेड था | जिसके निचे बैठ के गुरुनानक देव जी अपना आसन जमा लिया करते थे |

यह भी कहा जाता है कि गुरू जी के पवित्र चरण पड़ते ही यह पीपल का वृक्ष हरा-भरा हो गया । रात के समय योगियों ने अपनी योग शक्ति के द्वारा आंधी और बरसात शुरू कर दी और पीपल का वृक्ष हवा में ऊपर को उड़ने लगा। यह देकर गुरू नानकदेव जी ने इस पीपल के वृक्ष पर अपना पंजा लगा दिया जिसके कारण वृक्ष यहीं पर रुक गया। आज भी इस वृक्ष की जड़ें जमीन से 15 फीट ऊपर देखी जा सकती हैं। इसे आज लोग पंजा साहिब के नाम से जानते हैं।


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गुरूनानक जी के यहाँ से चले जाने के उपरान्त कालान्तर में इस पीपल के पेड़ में आग लगा दी और इस पीपल के पेड़ को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। उस समय बाबा अलमस्त जी यहाँ के सेवादार थे । उन्हें भी सिद्धों ने मार-पीटकर भगा दिया । सिक्खों के छठे गुरू हरगोविन्द साहिब को जब इस घटना की जानकारी मिली तो वे यहाँ पधारे और केसर के छींटे मार कर इस पीपल के वृक्ष को पुनः हरा-भरा कर दिया। आज भी इस पीपल के हरेक पत्ते पर केशर के पीले निशान पाये जाते हैं। गुरुद्वारे के अंदर एक सरोवर है, जहां अनेक श्रद्धालु आकर स्नान करते है फिर गुरुद्वारे में मथा टेकने जाते हैं और बाबा की कृपा पाते हैं तथा प्रत्येक वर्ष यहां दिवाली की अमावस्या से विशाल मेले का आयोजन किया जाता है । उस समय गुरुद्वारे व नगर की साज- सज्जा देखने लायक होती है । नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा में लगने वाला दीपावली का मेला भी इस क्षेत्र का विशालतम मेला माना जाता है एवम् प्रतिदिन गुरुद्वारे में लंगर की व्यवस्था की जाती है |
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Google Map Of Nanakmatta Gurudwara Sahib


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Nanakmatta Sahib In 360 Degree


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70 प्रतिशत लोगों ने दिया ‘हाई कोर्ट’ शिफ्टिंग का सुझाव High Court Shifting from Nainital…

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नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्टिंग के लिए 70 प्रतिशत सुझाव

70 Percent Suggestion for High Court Shifting from ‘Nainital’


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70 प्रतिशत लोगों ने की हाई कोर्ट शिफ्टिंग की मांग


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नैनीताल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ओर से कोर्ट को नैनीताल से अन्यत्र शिफ्ट करने को लेकर मांगे गए सुझाव से संबंधित नतीजे सामने आने लगे हैं | हाई कोर्ट को ओर से वेबसाइट पर सुझाव मांगे गए थे| वहीँ हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने हाई कोर्ट को किसी भी कीमत पर शिफ्ट नही होने देने का प्रस्ताव पारित किया हैं|
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मांगे गए थे सुझाव


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80 प्रतिशत लोग रानीबाग में स्थापित करने के पक्ष में

 

पूर्व में नैनीताल व् अब हल्द्वानी रह रहे वरिष्ट अधिवक्ता एमसी कांडपाल ने हाई कोर्ट को शिफ्ट करने की मांग को लेकर 2017 में प्रत्यावेदन दिया था| करीब दो माह पहले हाई कोर्ट की ओर से इस मामले में सुझाव मांगे गए तो अधिवक्ता भड़क गए| बार एसोसिएशन की आमसभा ने सर्वसम्मति से जबकि जिला बार एसोसिएशन की आमसभा ने बहुमत से हाई कोर्ट को नैनीताल से अन्यत्र शिफ्ट करने के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था| हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष व् दो बार के सांसद डॉ. महेंद्र पाल ने तो बाकायदा हाई कोर्ट शिफ्ट करने के मामले को सरकार की साजिश करार देते हुए पहले राज्य की स्थायी राजधानी गैरसैण घोषित करने की मांग की|

अब इस मामले को लेकर हाई कोर्ट की वेबसाइट आए सुझाव सार्वजानिक किय गए हैं| इसमें 70 फीसदी सुझाव नैनीताल से हाई कोर्ट को शिफ्ट करने के पक्ष में आया हैं| शिफ्टिंग के पक्ष वाले कुल सुझाव में से 80 फीसदी से अधिक ने रानीबाग H.M.T परिसर में शिफ्ट करने का सुझाव दिया हैं|  बताया क्जता हैं कि सुझाव देने वाले तमाम लोग ऐसे भी है,जिनके द्वारा एक नही पांच से अधिक बार भी हाई कोर्ट की शिफ्ट करते के पक्ष में सुझाव दिया हैं|इस लिए यह तय करना मुश्कल हो रहा है कितने प्रतिशत हाई कोर्ट शिफ्टिंग के पक्ष में व् कितने विरोध में सुझाव आए हैं|
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मेजर सोमनाथ ग्राउंड रानीखेत Somnath Ground Ranikhet, Almora (Uttarakhand) …

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‘सोमनाथ’ ग्राउंड व् ‘शैतान सिंह’ ग्राउंड रानीखेत का इतिहास Somnath Ground ,Shaitan Singh Ground Ranikhet

 

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको विजय दिवस के इस सुअवसर पर उत्तराखंड के हिल स्टेशन रानीखेत में स्थित मेजर सोमनाथ शर्मा ग्राउंड Somnath Ground Ranikhet तथा शैतान सिंह ग्राउंड Shaitan Singh Ground के बारे में बताने वाले हैं यदि आप जानना चाहते हैं इन प्रसिद्ध ग्राउंड के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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सोमनाथ ग्राउंड रानीखेत का इतिहास History Of ‘Somnath Ground’ Ranikhet

 

सोमनाथ मैदान उत्तराखंड राज्य, अल्मोड़ा जिले के रानीखेत में स्थित कुमाऊं रेजिमेंट का मुख्य परेड ग्राउंड है। यह ग्राउंड प्रथम परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता मेजर सोमनाथ के नाम पर बना हैं, जो 1947 के भारत-पाक युद्ध में बडगाम के युद्ध के दौरान भारत के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र के प्रथम प्राप्तकर्ता थे। इस जगह की यात्रा हमारे बहादुर भारतीय सेना के लिए प्रशंसा और सम्मान से भर देती है। यह ग्राउंड रानीखेत विजय चौक के पास स्थित हैं| इस ग्राउंड में भारतीय सेना की भर्तीयां भी आयोजित की जाती हैं मेजर सोमनाथ शर्मा 1947 में भारत – पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध में, वीरगति को प्राप्त हुए थे| वे उस वक्त कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन में डेल्टा कंपनी के कमांडर थे| कहा जाता है कि बडगाम में 700 पाकिस्तानी सेनिको ने हमला कर दिया| चारो ओर से घिरे होने तथा हॉकी खेलते हुए चोट लगने के बावजूद भी मेजर ने इस युद्ध में वीरता से दुश्मनों का सामना किया|अपने अंतिम क्षणों में भी उनके शव्द कुछ यूँ थे “दुश्मन हमसे महज 50 मीटर की दूरी पर हैं, पर हम एक इंच भी पीछे नही हटेंगे हम उनसे अंतिम गोली और अंतिम फौजी तक मुकाबला करेंगे”


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परमवीर चक्र से सम्मानित शैतान सिंह की कहानी 

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‘शैतान सिंह ग्राउंड’ का इतिहास  History Of Shaitan Singh Ground

शैतान सिंह ग्राउंड भी सैनिक अभ्यास का एक ग्राउंड हैं जो रानीखेत में कुमाऊँ रेजिमेंट सेंटर के आलमा लाइंस के पास हैं| यह ग्राउंड वीर मेजर शैतान सिंह के नाम पर बाना हैं| जिनके नाम से आज तक चीन की सेना डरती हैं|

1962 में जब भारत और चीन के मध्य युद्ध हुआ था तब भारत के पास संसाधनो का अभाव था उस आभाव में भी मेजर शैतान सिंह और उनके 123 सेनिको ने 1000 से अधिक चीनी सैनिको को मार गिराया था| रेजांगला दर्रे पर, जहाँ खून जमा देने वाली बर्फ थी वहां इन वीर सैनिकों ने अपनी आखिरी साँस तक अपने कर्तव्य का पालन करते हुए  अपना सर्वस्व भारत माता पर न्यौछावर कर दिया और शहीद हो गए।


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सम्मान-
मेजर शैतान सिंह के वीरता भरे देश प्रेम को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1963 में उन्हें  मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया |
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यहाँ तक कैसे पहुंचे How To Reach?

हवाई अड्डा – निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर हवाई अड्डा हैं यहाँ से रानीखेत की दूरी लगभग 109 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा बस से जा सकते हैं |

ट्रेन- निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम रेलवे स्टेशन हैं यहाँ से रानीखेत की दूरी लगभग 75 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा बस से जा सकते हैं |
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Google Map Of Somnath Ground Ranikhet


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उमीद करते हैं आपको हमारे इन वीर शाहसी जवानो के बारे में जान कर अच्छा लगा होगा| अगर आपको  यह पोस्ट पसंद आई तो इसे like तथा नीचे दिए बटनों द्वारा share जरुर करें|
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दंडेश्वर महादेव मंदिर (अल्मोड़ा) ‘Dandeshwar Mahadev’ Temple Almora (Uttarakhand)…

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‘दंडेश्वर महादेव मंदिर’ अल्मोड़ा ‘Dandeshwar Mahadev’ Temple Almora

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में अल्मोड़ा जिले में स्थित “दंडेश्वर मंदिर Dandeshwar Mahadev Temple” के बारे में बताने वाले है यदि आप जानना चाहते हैं “दंडेश्वर मंदिर Dandeshwar Mahadev Temple” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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दंडेश्वर मंदिर के बारे में Dandeshwar Mahadev Temple

उत्तराखंड के प्रमुख देवस्थालो में जागेश्वर धाम या मंदिर प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है | यह उत्तराखंड का सबसे बड़ा मंदिर समूह है | यह मंदिर कुमाउं मंडल के अल्मोड़ा जिले से 38 किलोमीटर की दुरी पर देवदार के जंगलो के बीच में स्थित है | जागेश्वर को उत्तराखंड का पाँचवा धाम भी कहा जाता है | जागेश्वर मंदिर में 124 मंदिरों का समूह है | इनमे से दंडेश्वर मंदिर सबसे प्रमुख मंदिर माना जाता हैं| यह मंदिर जागेश्वर मंदिर परिसर से थोड़ा ऊपर की ओर स्थित है। दांडेश्वर मंदिर परिसर जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है, जिसके कई अवशेष खंडहर में बदल गए हैं। यह स्थान अर्तोला गाँव से 200 मीटर की दूरी पर है जहाँ से जागेश्वर के मंदिर शुरू होते हैं इस जगह से विनायक क्षेत्र या पवित्र क्षेत्र शुरू होता है। यह स्थान झंकार साईं मंदिर, वृद्ध जागेश्वर और कोटेश्वर मंदिरों के बीच स्थित है। डंडेश्वर मंदिर जागेश्वर में स्थित है (जागेश्वर में 124 मंदिर समूह के बीच, दांडेश्वर उनमें से एक है। यह जागेश्वर मंदिर परिसर से थोड़ा ऊपर की ओर है।


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दंडेश्वर मंदिर का इतिहास History Dandeshwar Mahadev Temple Almora

दंडेश्वर मंदिर परिसर मुख्य जागेश्वर मंदिर परिसर से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ एक बड़ा मंदिर व 14 अधीनस्थ मंदिर हैं। वस्तुतः यही बड़ा मंदिर दंडेश्वर मंदिर है और इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और विशालतम मंदिर है। इन मंदिरों में कुछ, दंडेश्वर मंदिर के समीप ही एक चबूतरे पर स्थित हैं व कुछ इसके आसपास  हैं। इनमें कुछ मंदिरों के भीतर  शिवलिंग स्थापित हैं वहीं कुछ मंदिरों के भीतर चतुर्मुखलिंग स्थापित है।


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भगवान् शिव यहाँ लिंग रुपी ना होते हुए, शिला के रूप में स्थापित हैं।  यहाँ के पंडित जी  ने  इस मंदिर से जुडी दंतकथा के बारे में बताया की भगवान् शिव यहाँ के जंगल में ध्यानमग्न समाधिस्थ थे। उनके रूप व नीले अंग को देख इन जंगलों में रहने वाले ऋषियों की पत्नियां उन पर मोहित हो गयीं। इस पर क्रोधित हो कर ऋषियों ने शिव को शिला में परिवर्तित कर दिया। इसलिए शिव यहाँ शिला रूप में स्थापित हैं। पहले सुनी दंतकथा का यह दूसरा संस्करण पुजारीजी ने हमें बताया।कहा जाता है मंदिर का नाम दंडेश्वर दण्ड शब्द से लिया गया है। दंडेश्वर  मंदिर में वर्ष भर भक्तो का तांता लगा रहता |
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यहाँ तक कैसे पहुंचे How To Reach?

यहाँ तक आप आसानी से पहुँच सकते हैं|

जागेश्वर प्रमुख उत्तरी शहरों के साथ मोटर योग्य सड़कों के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से अल्मोड़ा के लिए विभिन्न बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

ट्रेन- निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम रेलवे स्टेशन हैं यहाँ से अल्मोड़ा की दूरी लगभग 82 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा बस से जा सकते हैं |

हवाई अड्डा – निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर हवाई अड्डा हैं यहाँ से अल्मोड़ा की दूरी लगभग 116 किलोमीटर है यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा बस से जा सकते हैं |
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Googel Map Of Dandeshwar Mahadev Temple Almora


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बैरासकुंड महादेव चमोली गढ़वाल ‘Bairaskund Mahadev’ chamoli Garhwal …

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 बैरासकुंड महादेव चमोली गढ़वाल ‘Bairaskund Mahadev’ chamoli Garhwal 

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में “ बैरासकुंड महादेव चमोली गढ़वाल Bairaskund Mahadev chamoli Garhwal” के बारे में बताने वाले हैं| यदि आप जानना चाहते हैं, “ बैरासकुंड महादेव चमोली गढ़वाल Bairaskund Mahadev chamoli Garhwal” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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 बैरासकुंड महादेव के बारे में About Bairaskund Mahadev chamoli Garhwal

उत्तराखंड के चमोली जिले में बैरासकुंड गाँव में स्थित, बैरास्कुंड महादेव मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। बैरासकुंड में कई प्राचीन मंदिर हैं और बैरास्कुंड महादेव मंदिर उनमें से सबसे लोकप्रिय है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण ने बैरासकुंड महादेव मंदिर में भगवान शिव की पूजा की जाती हैं| यहाँ प्रतिदिन सुबह 4 बजे शुरू होता है। मंदिर के मुख्य पुजारी और साधु, नेपाली महाराज, भगवान शिव की पूजा करते हैं और भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं, और पूजा दोपहर 12 बजे तक की जाती हैं| गाँव और आस-पास के गाँव के लोग भगवान शिव की पूजा करने के लिए मंदिर में आते हैं और ग्रामीणों द्वारा विभिन्न धार्मिक समारोहों का आयोजन साल भर किया जाता है। मंदिर समिति महा शिवरात्रि के दौरान मंदिर में एक धार्मिक मेले का आयोजन करती है। विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेले में शामिल होते हैं और भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं। सावन के माह में यहाँ शिवजी को जल चढाने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता हैं|


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बैरासकुंड महादेव का इतिहास History Of Bairaskund Mahadev chamoli garhwal

बैरासकुंड महादेव (विकास नगर घाट चमोली) रावण की तपो भूमि बैरासकुंड महादेव का मन्दिर विकास नगरघाट के  समीप स्थित है। यह मन्दिर पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ महादेव शिव का प्राचीन मन्दिर है, जिसकी पूजा अर्चना सदियों से होती चली आ रही है। कथाओं के अनुसार त्रेतायुग में शिव के परम भक्त रावण नें महादेव शिव की अखण्ड तपस्या की थी। रावण संहिता व केदारखण्ड़ शास्त्र आदि धार्मिक ग्रंथों में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है। इस मन्दिर का उल्लेख त्रेतायुग से ही आरम्भ हो गया था। आज भी महादेव शिव के दर्शनों के लिए भक्तों की संख्या कतार में लगी रहती है। यहां मन्दिर के आगे एक कुण्ड भी है, जिसमें पानी की मात्रा काफी अधिक है। कथाओं के अनुसार जब रावण के घनघोर तप करने के बाद भी महादेव शिव ने रावण को दर्शन नहीं दिये तो रावण ने इसी स्थान पर शिवतांडव तथा  जाप कर शिव की आराधना की और अपने दस सिर शिव को चढ़ा कर उन्हें प्रसन्न किया। इस स्थान पर जहाँ – जहाँ पर दस स्थानों पर रावण ने अपने सर रखे उन स्थानों को दसमोली कहा जाता है।


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यहाँ तक कैसे पहुंचे? How To Reach

सड़क से –  बैरास्कुंड महादेव मंदिर की यात्रा के लिए, आप बद्रीनाथ के लिए मार्ग लेते हैं। मार्ग नंदप्रयाग से निकलता है। नंदप्रयाग के लिए बसें और टैक्सी दिल्ली और देहरादून के प्रमुख शहरों से आसानी से उपलब्ध हैं। नंदाप्रेग से आप कमंडल पुल तक और फिर बैरास्कुंड महादेव मंदिर तक टैक्सी ले सकते हैं।

ट्रेन- बैरासकुंड महादेव मंदिर से निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश रेलवे स्टेशन है। ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से चमोली तक लगभग 126 किलोमीटर हैं| ऋषिकेश से आप बस या टैक्सी से जा सकते हैं

हवाई अड्डा–  बैरास्कुंड महादेव मंदिर से निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है। जॉली ग्रांट हवाई अड्डा नंदप्रयाग से 214 किमी दूर स्थित है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से नंदाप्रेग तक आपको आसानी से टैक्सी मिल जाएगी।
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Google Map Of Chamoli Garhwal


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‘गोपेश्वर महादेव मंदिर’ कंडा बागेश्वर Gopeshwar Mahadev Temple (kanda, Bageshwar)…

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‘गोपेश्वर महादेव मंदिर’ कंडा बागेश्वर ‘Gopeshwar Mahadev’ Temple (kanda, Bageshwar)

नमस्कार दोस्तों, आज हम आपको “उत्तराखंड दर्शन” के इस पोस्ट में “गोपेश्वर महादेव मंदिर Gopeshwar Mahadev Temple” के बारे में बताने वाले हैं यदि आप जानना चाहते हैं “गोपेश्वर महादेव मंदिर Gopeshwar Mahadev Temple” के बारे में तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े|


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गोपेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास History Of Gopeshwar Mahadev Temple

उत्तराखंड राज्य,  बागेश्वर जिले के धपोलासेरा में भद्रवती नदी के तट पर स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर हैं| यहाँ महाशिवरात्रि पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता हैं। दूर-दूर के गांवों से भक्त मंदिर में आते हैं। सुबह से ही जलाभिषेक को लोगों की लंबी लाइन लगी। पूरे दिन मंदिर में पूजा अर्चना चलती रही।

गोपेश्वर महादेव क्षेत्र का एकमात्र शिव मंदिर है। यहां पर भगवान शिव की शिवरात्रि पर विशेष पूजा की जाती है। मंदिर के पुजारी रावल लोग हैं। स्थानीय लोगो का कहना हैं कि मंदिर की स्थापना द्वापर युग से हुई है। वहा के लोगो का कहना हैं कि यहां पर शिव लिंग की उत्पत्ति स्वयं हुई है। जिसकी गहराई भद्रवती नदी तक है। इस शिवलिंग में जल अर्पण करने पर वह बाहर नहीं दिखाई देता है। कहते हैं कि पानी शिवलिंग से होकर नदी में समा जाता है। उन्होंने बताया कि जब क्षेत्र में बारिश नहीं होती तो इस मंदिर में सहस्त्र घट पानी चढ़ाया जाता है। इसके बाद लोगों की मन्नत पूरी हो जाती है।


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गोपेश्वर महादेव मंदिर की मान्यताए Gopeshwar Mahadev Temple

बागेश्वर। कांडा के धपोला सेरा स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर के साथ कई मान्यताएं जुड़ी हैं। किवदंती के अनुसार श्रीकृष्ण की गोपियों ने भगवान शिव के दर्शन होने के बाद इस मंदिर का निर्माण किया था। मंदिर को रात के वक्त बनाया गया था।लोक मान्यता के अनुसार द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के साथ यहां आए थे। इस दौरान भगवान शिव ने गोपियों को दर्शन दिए और गोपियों ने ही रातों रात इस मंदिर का निर्माण किया। लोगों का मानना है कि गर्मियों में बारिश नहीं होने और सूखा पड़ने पर इस मंदिर में जलाभिषेक किया जाए तो बारिश हो जाती है। इसी कारण क्षेत्र के लोग यहां शिवलिंग पर ग्यारह लोटा अथवा ग्यारह गागर जल चढ़ाते हैं। धारणा यह भी है कि अथाह जल चढ़ाने पर भी शिवलिंग जलमग्न नहीं होता। शिवलिंग की गहराई में ही पूरा जल समा जाता है।


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यहाँ तक कैसे पहुंचे? How To Reach?

हवाई अड्डा – निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर हवाई अड्डा हैं यहाँ से कांडा ( बागेश्वर) धपोलासेरा की दूरी लगभग 216 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा बस से जा सकते हैं|

ट्रेन- निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम रेलवे स्टेशन हैं यहाँ से कांडा (बागेश्वर) धपोलासेरा की दूरी लगभग 182 किलोमीटर हैं यहाँ से आप आसानी से टैक्सी अथवा कार से जा सकते हैं |

सड़क से – यहाँ तक पहुचने के दो रास्ते हैं एक बागेश्वर से कांडा होते हुए धपोला सेरा तक गाड़ी का रास्ता हैं| बागेश्वर से कांडा की दूरी लगभग 17 किलोमीटर हैं| कांडा से धपोलासेरा की दूरी लगभग 44 किलोमीटर हैं| दूसरा विजयपुर से धपोलासेरा लगभग 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा तय करनी पढ़ती हैं|


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Google Map Of Kanda Bageshwar


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