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माँ वाराही देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये (देवीधुरा ) ! History and Beliefs of Mata Varahi Devi Temple ( Devidhura )

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माँ वाराही देवी मंदिर का इतिहास !

History of Maa Varahi Devi Temple

“वाराही मंदिर” उत्तराखण्ड राज्य के लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर दूर स्थित है। शक्तिपीठ माँ वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से भी जाना जाता हैं।समुद्र तल से लगभग 1850 मीटर (लगभग पाँच हजार फीट) की उँचाई पर स्थित है । देवीधुरा में बसने वाली “माँ वाराही का मंदिर” 52 पीठों में से एक माना जाता है |
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उत्तराखंड के नैनीताल जिले से लगे पाटी विकासखंड के देवीधुरा में स्थित मां वाराही धाम अटूट आस्था का केंद्र है । आषाढ़ी सावन शुक्ल पक्ष में यहां गहड़वाल, चम्याल, वालिक और लमगड़िया खामों  के बीच बग्वाल (पत्थरमार युद्ध) होता है। देवीधूरा में वाराही देवी मंदिर शक्ति के उपासकों और श्रद्धालुओं के लिये वह पावन और पवित्र स्थान है | जहां पहुंचते ही अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है |

यह क्षेत्र देवी का “उग्र पीठ” माना जाता है | इसे पूर्णागिरी की तरह ही माना जाता है। समुद्र की सतह से लगभग २००० फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान प्राचीन एवं ऎतिहासिक स्थल से साथ साथ कई पौराणिक कथायें भी जुड़ी हैं।

इतिहास माँ वाराही देवी मंदिर का :-

चन्द राजाओं के शासन काल में इस सिद्ध पीठ में चम्पा देवी और ललत जिह्वा महाकाली की स्थापना की गई थी। तब “लाल जीभ वाली महाकाली को महर” और फर्त्यालो द्वारा बारी-बारी से प्रतिवर्ष नियमित रुप से नरबलि दी जाती थी। बताया जाता है कि रुहेलों के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा वाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक भवन में स्थापित कर दिया गया था। धीरे-धीरे इसके चारो ओर गांव स्थापित हो गये और यह मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र बन गया । यह भी बताया जाता है कि पहाड़ी के छोर पर खेल-खेल में भीम ने शिलायें फेंकी थी | ( माँ वाराही देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये )

ग्रेनाइट की इन विशाल शिलाओं में से दो शिलायें आज भी मन्दिर के निकट मौजूद हैं। जिनमें से एक को राम शिला  कहा जाता है , इस स्थान पर ‘पचीसी’ नामक जुए के चिन्ह आज भी विद्यमान हैं । जनश्रुति के अनुसार यहां पर पाण्डवों ने जुआ खेला था | उसी के समीप दूसरी शिला पर हाथों के भी निशान हैं।

माँ वाराही देवी मंदिर की पौराणिक कथा

Mythology of Maa Varahi Devi Temple

पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थान गुह्य काली की उपासना का केन्द्र था | जहां किसी समय में काली के गणों को प्रसन्न करने के लिये नरबलि की प्रथा थी। इस प्रथा को कालान्तर में स्थानीय लोगों द्वारा बन्द कर दिया गया । इससे पहले देवीधूरा के आस-पास निवास करने वाले लोगों वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहडवाल खामों (वर्ग) के थे, इन्हीं खामों में से प्रत्येक वर्ष एक व्यक्ति की बारी-बारी से बलि दी जाती थी।

लेकिन वर्तमान समय में माँ वाराही देवी की यह मान्यता भी है कि चम्याल खाम की एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न होने के बाद नर की बलि बंद कर दी गयी और “बग्वाल” की परम्परा शुरू हुई | इस बग्वाल में चार खाम उत्तर की ओर से लमगड़िया , दक्षिण की ओर से चम्याल ,    पश्चिम की ओर से वालिक , पूर्व की ओर से गहडवाल के रणबांकुरे बिना जान की परवाह किये एक इंसान के रक्त निकलने तक युद्ध लड़ते हैं | लेकिन भले ही तीन साल से बग्वाल फल-फूलो से खेली जा रही हो | उसके बावजूद भी योद्धा घायल होते हैं और उनके शरीर रक्त निकलता दिखता है |
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माँ वाराही देवी मंदिर की मान्यताये

Beliefs of Maa Varahi Devi Temple

मुख्य मंदिर गगोरि नामक कंदराओं  के बारे में कहते हैं कि इन चट्टानों के बीच से ही देवी ने अपने ग्रह में प्रवेश किया था | यह दोनों विशाल चट्टानों बहुत सक्रिय और सटी हुई है एक पत्थर से निरंतर तेल सदृश द्रव्य निकलता रहता था | दोनों सकरी चट्टानों के बीच से ही प्रवेशद्वार बना है | चट्टानों के मध्य के खाली जगह पर ही “देवी पीठ” है | लोक मान्यता है कि पहले यहां वाराही देवी साक्षात विराजमान थे | परंतु बाद में उन्होंने अपने स्थान पर केवल अपना विग्रह छोड़ दिया |
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माँ वाराही देवी के मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां वाराही देवी की मूर्ति है | मगर पेटिका में रखी इस देवी मूर्ति के दर्शन अभी तक किसी ने नहीं किए हैं | ( माँ वाराही देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये )

माँ वाराही देवी के बारे में यह मान्यता  है कि कोई भी व्यक्ति मूर्ति के दर्शन खुली आँखों से नहीं कर सकता है , क्युकी मूर्ति के तेज से उसकी आँखों की रोशनी चली जाती है। इसी कारण “देवी की मूर्ति” को ताम्रपेटिका में रखी जाती है।

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पूर्णागिरी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये ! History and Beliefs of Purnagiri Temple , Uttarakhand

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पूर्णागिरी मंदिर का इतिहास

History of Purnagiri Temple

उत्तराखण्ड के कण-कण में देवी-देवताओं का वास होने के चलते इसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है | उत्तराखण्ड के चम्पावत जिले में पड़ने वाले उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध स्थान में “मां पूर्णागिरि” का दरबार है |


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पूर्णागिरि मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के चम्पावत नगर में काली नदी के दांये किनारे पर स्थित है । चीन, नेपाल और तिब्बत की सीमाओं से घिरे सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण चम्पावत ज़िले के प्रवेशद्वार टनकपुर से 19 किलोमीटर दूर स्थित यह शक्तिपीठ माँ भगवती की 108 सिद्धपीठों में से एक है। उत्तराखण्ड जनपद चम्पावत के टनकपुर के पर्वतीय अंचल में स्थित अन्नपूर्णा चोटी के शिखर में लगभग 3000 फीट की उंचाई पर यह शक्तिपीठ स्थापित है अर्थात ” पूर्णागिरी मंदिर”

पूर्णागिरी मंदिर की स्थापना :-

पूर्णागिरी मंदिर की यह मान्यता है कि जब भगवान शिवजी तांडव करते हुए यज्ञ कुंड से सती के शरीर को लेकर आकाश गंगा मार्ग से जा रहे थे | तब भगवान विष्णु ने तांडव नृत्य को देखकर सती के शरीर के अंग के टुकड़े कर दिए जो आकाश मार्ग से पृथ्वी के विभिन्न स्थानों में जा गिरी |

कथा के अनुसार जहा जहा देवी के अंग गिरे वही स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गए | माता सती का “नाभि” अंग चम्पावत जिले के “पूर्णा” पर्वत पर गिरने से माँ “पूर्णागिरी मंदिर” की स्थापना हुई |



तब से देश की चारों दिशाओं में स्थित मल्लिका गिरि , कालिका गिरि , हमला गिरि व पूर्णागिरि में इस पावन स्थल पूर्णागिरि को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ |

पौराणिक कथा पूर्णागिरी मंदिर :-

पुराणों के अनुसार महाभारत काल में प्राचीन ब्रह्मकुंड के निकट पांडवों द्वारा देवी भगवती की आराधना तथा बह्मदेव मंडी में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा द्वारा आयोजित विशाल यज्ञ में एकत्रित अपार सोने से यहां सोने का पर्वत बन गया । सन् 1632 में कुमाऊं के राजा ज्ञान चंद के दरबार में गुजरात से पहुंचे श्रीचन्द्र तिवारी को इस देवी स्थल की महिमा स्वप्न में देखने पर उन्होंने यहा मूर्ति स्थापित कर इसे संस्थागत रूप दिया।

देश के चारों दिशाओं में स्थित कालिकागिरि, हेमलागिरि व मल्लिकागिरि में मां पूर्णागिरि का यह शक्तिपीठ सर्वोपरि महत्व रखता है। आसपास जंगल और बीच में पर्वत पर विराजमान हैं ” भगवती दुर्गा “ । इसे शक्तिपीठों में गिना जाता है । इस शक्तिपीठ में पूजा के लिए वर्ष-भर यात्री आते-जाते रहते हैं | चैत्र मास की नवरात्र में यहां मां के दर्शन का विशेष महत्व बढ जाता है |
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पूर्णागिरी मंदिर की मान्यताये
Beliefs of Purnagiri Temple

सिद्ध बाबा मंदिर की कथा :-

पूर्णागिरी मंदिर के सिद्ध बाबा के बारे में यह कहा जाता है | कि एक साधू ने व्यर्थ रूप से माँ पूर्णागिरी के उच्च शिखर पर पहुचने की कोशिश करी | तो माँ ने क्रोध में साधू को नदी के पार फेक दिया | मगर दयालु माँ ने इस संत को “सिद्ध बाबा” के नाम से विख्यात कर उसे आशीर्वाद दिया | जो व्यक्ति मेरे दर्शन करेगा , वो उसके बाद तुम्हारे दर्शन भी करने आएगा | जिससे कि उसकी मनोकामना पूरी होगा | कुमाऊं के अधिकतर लोग सिद्धबाबा के नाम से मोटी रोटी बना कर सिद्धबाबा को भेट स्वरुप चढाते है |(पूर्णागिरी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये)
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पूर्णागिरी मंदिर में स्थित “झूठे का मंदिर” की कहानी :-

पौराणिक कथा के अनुसार यह भी उल्लेख है कि एक बार संतान विहीन सेठ को देवी ने सपने में कहा कि “मेरे दर्शन के बाद ही तुम्हे पुत्र होगा” | सेठ ने माँ पूर्णागिरी के दर्शन किये और कहा कि यदि उसका पुत्र होगा तो वह देवी के लिए सोने का मंदिर बनाएगा | मनोकामना पूरी होने पर सेठ ने लालच कर सोने के मंदिर की जगह ताम्बे के मंदिर में सोने की पॉलिश लगाकर देवी को अर्पित करने के लिए मंदिर की ओर जाने लगा तो ” टुन्याश ” नामक स्थान पर पहुचकर | वह ताम्बे के मंदिर को आगे नहीं ले जा सका था | तब सेठ को उस मंदिर को उसी स्थान में रखना पडा | तब से वो मंदिर पौराणिक समय से वर्तमान में “झूठे का मंदिर” नाम से जाना जाता है | (पूर्णागिरी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये)

पूर्णागिरी मंदिर की मान्यता यह भी है कि देवी और उनके भक्तो के बीच एक अलिखित बंधन की साक्शी मंदिर परिसर में लगी रंगबिरंगी लाल-पीली चीरे आस्था की महिमा को बयान करती है | मनोकामना पूरी होने पर पूर्णागिरी मंदिर के दर्शन व आभार प्रकट करने और ‘चीर की गांठ’ खोलने आने की मान्यता भी है |

नवरात्रियो में पूर्णागिरी मंदिर की मान्यता  यह है कि नवरात्री में देवी के दर्शन से व्यक्ति महँ पुण्य का भागिदार बनता है | देवी सप्तसती में इस बात का उल्लेख है कि नवरात्रियो में वार्षिक महापूजा के अवसर पर जो व्यक्ति देवी के महत्व की शक्ति निष्ठापूर्वक सुनेगा | वो व्यक्ति सभी बाधाओ से मुक्त होकर धन धान्य से संपन्न होगा |

पूर्णागिरी मंदिर के बारे में यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर मुंडन कराने पर बच्चा दीर्घायु और बुद्धिमान होता है | इसलिए इसकी विशेष महत्वता है | लाखो तीर्थ यात्री इस स्थान में मुंडन करने के लिए पहुचते है | प्रसिद्ध वन्याविद एवम् आखेट प्रेमी जिम कॉर्बेट ने सन 1927 में विश्राम कर अपनी यात्रा में पूर्णागिरी के प्रकाश पुंजो को स्वयम देखकर इस देवी शक्ति के चमत्कार का देशी और विदेशी अखबारों में उल्लेख कर इस पवित्र स्थल को काफी मशहूर किया | कहा जाता है कि जो भक्त सच्ची आस्था लेकर पूर्णागिरी की दरबार में आता है , मनोकामना साकार कर ही लौटता है |

उम्मीद करते है कि “पूर्णागिरी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये “ के बारे में पढ़कर आपको आनंद आया होगा |

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View 360 degree images of Purnagiri Temple




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कसार देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये ! (History and Beliefs of Kasar Devi Temple , Almora)

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिर “कसार देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये” के बारे में जानकारी देने वाले है , इसलिए इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े |

अल्मोड़ा में स्थित प्रसिद्ध मंदिर के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे !

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[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये , अल्मोड़ा (History and Beliefs of Chitai Golu Devta Temple , Almora)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-and-beliefs-of-chitai-golu-devta-temple-almora/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#4392e8′ custom_content=” color=” custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

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कसार देवी मंदिर का इतिहास !

History of Kasaar Devi temple

शक्ति के आलोकिक रूप का प्रत्यक्ष दर्शन उत्तराखंड देवभूमि में होता है |(कसार देवी मंदिर का इतिहास और मान्यताये )

उत्तराखंड राज्य अल्मोड़ा जिले के निकट “कसार देवी” एक गाँव है | जो अल्मोड़ा क्षेत्र से 8 km की दुरी पर काषय (कश्यप) पर्वत में स्थित है | यह स्थान “कसार देवी मंदिर” के कारण प्रसिद्ध है | यह मंदिर, दूसरी शताब्दी के समय का है । 

उत्तराखंड के अल्मोडा जिले में मौजूद माँ कसार देवी की शक्तियों का एहसास इस स्थान के कड़-कड़ में होता है | अल्मोड़ा बागेश्वर हाईवे पर “कसार” नामक गांव में स्थित ये मंदिर कश्यप पहाड़ी की चोटी पर एक गुफानुमा जगह पर बना हुआ है |कसार देवी मंदिर में माँ दुर्गा साक्षात प्रकट हुयी थी | मंदिर में माँ दुर्गा के आठ रूपों में से एक रूप “देवी कात्यायनी” की पूजा की जाती है |
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इस स्थान में ढाई हज़ार साल पहले “माँ दुर्गा” ने शुम्भ-निशुम्भ नाम के दो राक्षसों का वध करने के लिए “देवी कात्यायनी” का रूप धारण किया था | (कसार देवी मंदिर का इतिहास और मान्यताये)

माँ दुर्गा ने देवी कात्यायनी का रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया था | तब से यह स्थान विशेष माना जाता है | स्थानीय लोगों की माने तो दूसरी शताब्दी में बना यह मंदिर 1970 से 1980 की शुरुआत तक डच संन्यासियों का घर हुआ करता था। यह मंदिर हवाबाघ की सुरम्य घाटी में स्थित है ।

कहते है कि स्वामी विवेकानंद 1890 में ध्यान के लिए कुछ महीनो के लिए इस स्थान में आये थे | अल्मोड़ा से करीब 22 km दूर काकडीघाट में उन्हें विशेष ज्ञान की अनुभूति हुई थी | इसी तरह बोद्ध गुरु “लामा अन्ग्रिका गोविंदा” ने गुफा में रहकर विशेष साधना करी थी |

यह क्रैंक रिज के लिये भी प्रसिद्ध है , जहाँ 1960-1970 के दशक में “हिप्पी आन्दोलन” बहुत प्रसिद्ध हुआ था | उत्तराखंड देवभूमि का ये स्थान भारत का एकमात्र और दुनिया का तीसरा ऐसा स्थान है , जहाँ ख़ास चुम्बकीय शक्तियाँ  उपस्थित है | कसारदेवी मंदिर की अपार शक्ति से बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं। ( कसार देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये )

दुनिया के तीन पर्यटन स्थल ऐसे हैं जहां कुदरत की खूबसूरती के दर्शनों के साथ ही मानसिक शांति भी महसूस होती है। जिनमें अल्मोड़ा स्थित “कसार देवी मंदिर” और दक्षिण अमरीका के पेरू स्थित “माचू-पिच्चू”इंग्लैंड के “स्टोन हेंग” में अद्भुत समानताएं हैं । ये अद्वितीय और चुंबकीय शक्ति के केंद्र भी हैं। यह क्षेत्र ‘चिड’ और ‘देवदार’ के जंगलों का घर है |यह न केवल अल्मोड़ा और हावाघ घाटी के दृश्य प्रदान करता है | साथ ही साथ हिमाचल प्रदेश सीमा पर बंदरपंच शिखर से नेपाल में स्थित ‘एपी हिमल’ हिमालय के मनोरम दृश्य भी प्रदान करता है।

अल्मोड़ा में कसार देवी मंदिर के साथ साथ चितई गोलू देवता मंदिर और द्वाराहाट क्षेत्र के दूनागिरी मंदिर के दर्शन भी कर सकते है |

हिन्दुस्तान के लोग शायद ही ये जानते होंगे कि ये स्थान जितना प्राचीन और धार्मिक महत्व का है | उतना ही वैज्ञानिक लिहाज से भी अहम है।
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कसार देवी मंदिर की मान्यताये

Beliefs of Kasar Devi Temple , (Almora) 

आस्था , श्रधा , विश्वास और मंदिर आदि का बहुत ही गहरा सम्बन्ध है | क्यूंकि यदि व्यक्ति के मन में आस्था , श्रधा न हो तो मंदिर में रखी गयी मूर्ति भी उसके लिए पत्थर के समान लगती है |

मंदिरों की बात करे तो भारत देश में ऐसे कई मंदिर है , जिनकी बहुत मान्यता है |

मंदिर में जाने से कोई भी व्यक्ति कभी भी खाली हाथ नहीं लौटता है |

कसार देवी मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहाँ आने वाले भक्तो की हर मनोकामना अतिशीघ्र पूर्ण हो जाती है | ( कसार देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये )
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इस जगह में कुदरत की खूबसूरती के दर्शन तो होते ही हैं, साथ ही मानसिक शांति भी महसूस होती है |यह स्थान ध्यान ओर योग करने लिऐ बहुत ही उचित है । भक्तो को सैकडों सीढ़ियां चढ़ने के बाद भी थकान महसूस नही होती है । यहां आकर श्रद्धालु असीम मानसिक शांति का अनुभव करते हैं।

कसार देवी मंदिर “चुम्बकीय” क्षेत्र

यह जगह अद्वितीय और चुंबकीय शक्ति का केंद्र भी है। नासा के वैज्ञानिक चुम्बकीय रूप से इस जगह के चार्ज होने के कारण और प्रभावों पर जांच कर रहे है | डॉक्टर अजय भट्ट का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र “वैन ऐलन बेल्ट” है | इस जगह में धरती के अन्दर विशाल चुम्बकीय पिंड है | इस पिंड में विद्युतीय चार्ज कणों की परत होती है | जिसे रेडिएशन भी कहते है |

यह वह पवित्र स्थान है , जहां भारत का प्रत्येक सच्चा धर्मालु व्यक्ति अपने जीवन का अंतिम काल बिताने को इच्छुक रहता है। अनूठी मानसिक शांति मिलने के कारण यहां देश-विदेश से कई पर्यटक
आते हैं ।प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा में (नवम्बर-दिसम्बर) को कसार देवी का मेला लगता है |

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दूनागिरी मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! (History and beliefs of Dunagiri temple ,Almora)

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[av_heading tag=’h2′ padding=’10’ heading=’दूनागिरी मंदिर का इतिहास और मान्यताये (History and beliefs of Doonagiri temple) !! , Almora ‘ color=” style=’blockquote modern-quote modern-centered’ custom_font=” size=” subheading_active=” subheading_size=’15’ custom_class=” admin_preview_bg=”][/av_heading]

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नमस्कार दोस्तों , आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिर “दूनागिरी मंदिर अर्थात दूनागिरी मंदिर का इतिहास और मान्यताये “ के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप अल्मोड़ा जिले में स्थित “दूनागिरी मंदिर” के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

अल्मोड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे !

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[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये , अल्मोड़ा (History and Beliefs of Chitai Golu Devta Temple , Almora)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-and-beliefs-of-chitai-golu-devta-temple-almora/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#4e98e8′ custom_content=” color=’custom’ custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’बिनसर महादेव मंदिर का इतिहास एवम् पौराणिक मान्यताये ! (Binsar Mahadev Temple , Ranikhet)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-and-mythological-beliefs-of-binsar-mahadev-temple/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#4e98e8′ custom_content=” color=’custom’ custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’कसार देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये ! (History and Beliefs of Kasar Devi Temple , Almora)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-and-beliefs-of-kasar-devi-temple-almora/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#4e98e8′ custom_content=” color=’custom’ custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’नंदा देवी मंदिर का इतिहास , पौराणिक कथा एवम् मान्यताऐ | HISTORY , MYTHOLOGY AND BELIEFS OF MAA NANDA DEVI TEMPLE (ALMORA)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-mythology–beliefs-and-of-maa-nanda-devi-temple/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#4e98e8′ custom_content=” color=’custom’ custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

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दूनागिरी मंदिर का इतिहास

History of Doonagiri Temple

उत्तराखंड जिले में बहुत पौराणिक और सिद्ध शक्तिपीठ है | उन्ही शक्तिपीठ में से एक है द्रोणागिरी वैष्णवी शक्तिपीठ |वैष्णो देवी के बाद उत्तराखंड के कुमाऊं में “दूनागिरि” दूसरी वैष्णो शक्तिपीठ है | उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट क्षेत्र से 15 km आगे माँ दूनागिरी माता का मंदिर अपार आस्था और श्रधा का केंद्र है |

मंदिर निर्माण के बारे में  यह कहा जाता है कि त्रेतायुग में जब लक्ष्मण को मेघनात के द्वारा शक्ति लगी थी | तब सुशेन वेद्य ने हनुमान जी से द्रोणाचल नाम के पर्वत से संजीवनी बूटी लाने को कहा था | हनुमान जी उस स्थान से पूरा पर्वत उठा रहे थे तो वहा पर पर्वत का एक छोटा सा टुकड़ा गिरा और फिर उसके बाद इस स्थान में दूनागिरी का मंदिर बन गया |

कत्यूरी शासक सुधारदेव ने 1318 ईसवी में मंदिर निर्माण कर दुर्गा मूर्ति स्थापित की।इतना ही नहीं मंदिर में शिव व पार्वती की मूर्तियाँ विराजमान है।

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हिमालय गजिटेरियन के लेख ईटी एडकिंशन के अनुसार मंदिर होने का प्रमाण सन् 1181 शिलालेखों में मिलता है । इस पर्वत पर पांडव के गुरु द्रोणाचार्य द्वारा तपस्या करने पर इसका नाम द्रोणागिरि भी है | पुराणों उपनिषदो व इतिहासवादियों ने दूनागिरी की पहचान माया-महेश्वरी या प्रकृति-पुरुष व दुर्गा कालिका के रुप में की है |

इसी पर्वत पर स्थित भगवान गणेश के नाम से एक चोटी का नाम गणेशाधार पूर्व से प्रचलित है। बताते है कि लंका युद्ध के दौरान लक्ष्मण का द्रोणांचल पर्वत से उपचार तथा मायावी राक्षस कालनेमी व हनुमान युद्ध का प्रसंग इसके त्रेतायुगी इतिहास को बताता है | ( दूनागिरी मंदिर का इतिहास और मान्यताये )

देवी पुराण के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव ने युद्ध में विजय तथा द्रोपती ने सतीत्व की रक्षा के लिए दूनागिरी की दुर्गा रुप में पूजा की ।

स्कंदपुराण के मानसखंड द्रोणाद्रिमहात्म्य में दूनागिरी को महामाया, हरिप्रिया, दुर्गा के अनूप विशेषणों के अतिरिक्त वह्च्मिति के रुप में प्रदर्शित किया गया है | इस भव्य मंदिर के दर्शन करने के लिए करीब 500 सीढ़ियां चढ़नी होती है |

यह मंदिर बास , देवदार , अकेसिया ,और सुरई समेत विभिन्न प्रजाति के पेड़ो के बीच में स्थित है । इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की जीवनदायिनी जड़ी, बूटियां भी मिलती हैं | मंदिर से हिमालय पर्वतो के भव्य दर्शन होते है |
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दूनागिरी मंदिर की मान्यताये

(Beliefs of Doonagiri temple)

द्वाराहाट में स्थापित इस मंदिर में वैसे तो पूरे वर्ष भक्तों की कतार लगी रहती है |मगर नवरात्र में यहां मां दुर्गा के भक्त दूर- दराज से बड़ी संख्या में आशीर्वाद लेने आते हैं | इस स्थान में “माँ दूनागिरी” वैष्णवी रूप में पूजी जाती है |

दूनागिरी मंदिर के बारे में यह भी माना जाता है कि यहाँ जो भी महिला अखंड दीपक जलाकर संतान प्राप्ति के लिए पूजा करती है | देवी वैष्णवी उसे संतान का सुख प्रदान करती है |
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दूनागिरी मंदिर की मान्यता यह भी है कि इस महाशक्ति के दरबार में जो शुद्ध बुद्धि से आता है और सच्चे मन से कामना करता है , वह अवश्य पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में सोने और चांदी के छत्र , घंटिया , शंख चढाते है |

मंदिर में लगी हुई हजारो घंटिया प्रेम , आस्था और विश्वास की प्रतीक है, जो भक्तों का माँ दूनागिरी के प्रति है। ( दूनागिरी मंदिर का इतिहास और मान्यताये )

दूनागिरी मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है | प्राकृतिक रूप से निर्मित सिद्ध पिण्डियां माता भगवती के रूप में पूजी जाती हैं। दूनागिरी मंदिर में अखंड ज्योति का जलना मंदिर की एक विशेषता है | दूनागिरी माता का वैष्णवी रूप में होने से इस स्थान में किसी भी प्रकार की बलि नहीं चढ़ाई जाती है | यहाँ तक की मंदिर में भेट स्वरुप अर्पित किया गया नारियल भी मंदिर परिसर में नहीं फोड़ा जाता है |

अल्मोड़ा में दूनागिरी मंदिर के दर्शन के साथ साथ आप चितई गोलू देवता मंदिर के भी दर्शन कर सकते है |

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पौड़ी गढ़वाल का इतिहास ! (History of Pauri Garhwal) |

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पौड़ी गढ़वाल का इतिहास !(History of Pauri garhwal)

चारो तरफ पहाड़िया और बीच में है “पौड़ी” | उत्तराखंड की एक बेहद सुन्दर जगह है | “पौड़ी”  उत्तराखंड राज्य का एक जिला है | इस जिले का मुख्यालय पौड़ी है |यह जिला मध्य हिमालय में कंडोलिया की पहाड़िया में स्थित है |

समुन्द्रतल से 1750 मीटर की ऊँचाई में स्थित ” पौड़ी ” हिल स्टेशन के रूप में भी जाना जाता है |

पुरे सालभर में पौड़ी का वातावरण बहुत ही सुहाना रहता है | पौड़ी गढ़वाल की मुख्य नदियों में से अलकनंदा और नायर मुख्य है | इस स्थान की मुख्य भाषा “गढ़वाली” है | अन्य भाषा में स्थानीय लोग हिंदी , अंग्रेजी भाषा को बेहतरीन रूप में बोलते है |यहाँ के लोकगीत , संगीत व नृत्य यहाँ की संस्कृति की संपूर्ण जगह में अपनी पहचान छोड़ते है |

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मंडल मुख्यालय के साथ ही “पौड़ी” ब्रिटिश काल में गढ़वाल की सांस्कृतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र है | विभिन्न तीर्थस्थल स्थल भक्त को इस विदेशी जमीन के लिए आकर्षित करता है ( कलेश्वर महादेव मंदिर ) उन्हें एक है | पौड़ी गढ़वाल जिला 9 तहसील और 15 विकास ब्लॉक में विभाजित है |

पौड़ी की अतुल्य सुन्दरता के कारण अंग्रेजो ने इसे हिलस्टेशन के रूप में विकसित किया |
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पौड़ी गढ़वाल का इतिहास (History of Pauri Garhwal)

भारतवर्ष का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की गढ़वाल के हिमालय क्षेत्र का है |

पौराणिक शासन “पौड़ी गढ़वाल” का :-

दस्तावेज के अनुसार पौराणिक काल में पुरे भारतवर्ष में रजवाड़े निवास करते थे | और उनके राजा राज्य में राज करते थे |

इसी प्रकार सबसे पहले उत्तराखंड के पहाड़ो में सबसे पहले राजवंश “कत्युरी” था |

जिन्होंने अखंड उत्तराखंड पर शासन किया और शिलालेख और मंदिरों के रूप में कुछ महत्वपूर्ण निशान छोड़ गए । कत्युरी के पतन के बाद के समय में, यह माना जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र एक सरदार द्वारा संचालित साठ से अधिक चार राजवंशों में विखंडित था |एक प्रमुख सेनापति चंद्रपुरगढ़ क्षेत्र के थे ।

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15 वीं शताब्दी के मध्य में :- चंद्रपुरगढ़ के राजा जगतपाल (1455 से 14 9 3) के शासन के अंतर्गत एक शक्तिशाली शासन के रूप में उभरा , जो कनकपाल के वंशज थे । 15 वीं शताब्दी के अंत में राजा अजयपाल ने चंद्रपुरगढ़ का शासन किया और इस क्षेत्र पर शासन किया। इसके बाद, उसके राज्य को गढ़वाल के रूप में जाना जाने लगा और उन्होंने 1506 ई से पहले चंद्रगढ़ से देवलागढ़ तक अपनी राजधानी और 1506 से 1519 के बीच श्रीनगर को स्थानांतरित कर दिया।

राजा अजयपाल और उनके उत्तराधिकारियों ने लगभग तीन सौ साल तक गढ़वाल के क्षेत्र पर शासन किया था | इस अवधि के दौरान उन्होंने कुमाऊं, मुगल, सिख और रोहिल्ला से कई हमलों का सामना किया था।

गढ़वाल के इतिहास में दर्दनाक घटना :-

गढ़वाल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और बेहद दर्दनाक घटना तब हुई जब गोरखों ने इस पर आक्रमण किया | गोरखे बेहद क्रूर थे और ‘गोरख्याणी’ शब्द कत्लेआम और सेना के लूटमार का प्रयाय बन गया | डोटी और कुमाऊं पर कब्जा करने के बाद गोरखों ने गढ़वाल पर आक्रमण कर दिया, गढ़वाली सेना के जबरदस्त विरोध और चुनौती पेश करने के बावजूद वे लंगूरगढ़ तक पहुंच गए | इसी समय चीन के आक्रमण की खबर से गोरखों ने अपने आक्रमण की धार को कुछ धीमा कर दिया | 1803 में उन्होंने एक बार फिर आक्रमण तेज कर दिया | ( पौड़ी गढ़वाल का इतिहास )

कुमाऊं क्षेत्र को पूरी तरह अपने कब्जे में लेने के बाद गोरखों ने पूरी ताकत के साथ गढ़वाल पर हमला बोल दिया | गोरखों की विशाल सेना के सामने गढ़वाल के 5 हजार सैनिक टिक नहीं पाए | इस बीच राजा प्रद्युमन शाह देहरादून भाग गए ताकि गोरखों के ख‍िलाफ रक्षा की नीति बना सकें, लेकिन गोरखों की ताकत के आगे सब बेकार साबित हुआ | इस जंग में गढ़वाली सेना को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ और स्वयं राजा प्रद्युमन शाह ‘खुदबुद’ की लड़ाई में मारे गए | सन 1804 में गोरखों ने पूरे गढ़वाल पर कब्जा कर लिया |

सन 1815 में अंग्रेजो का आक्रमण :-

अगले करीब 12 साल तक पूरे उत्तराखंड में गोरखों का क्रूर शासन रहा | इसके बाद 1815 में अंग्रेजों ने गोरखों के जबरदस्त विरोध और चुनौती पेश करने के बावजूद उन्हें यहां से खदेड़ कर काली नदी के पार भेज दिया | 21 अप्रैल 1815 को अंग्रेजों ने पूरे क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया | हालांकि यह भी गुलामी ही थी लेकिन अंग्रेजों ने गोरखों की तरह क्रूरता नहीं दिखाई |अंग्रेजों ने पश्चिमी गढ़वाल क्षेत्र अलकनंदा और मंदाकिनी नदी के पश्चिम में अपना राज स्थापित कर लिया और इसे ब्रिटिश गढ़वाल कहा जाने लगा | इसमें देहरादून भी शामिल था । पश्चिम में गढ़वाल का शेष हिस्सा  “राजा सुदर्शन शाह” को दे दिया था | उन्होंने टिहरी को अपनी राजधानी बनायीं | कुमाउं और गढ़वाल के प्रशासन को संभालने के लिए अंग्रेजो ने एक कमिश्नर रखा |जिसका मुख्यालय नैनीताल में था | ( पौड़ी गढ़वाल का इतिहास )

उसके बाद 1840 में पौड़ी गढ़वाल को अलग जिला बता कर असिस्टेंट कमिश्नर के अंतर्गत दे दिया | जिसका मुख्यालय “पौड़ी” में बनाया गया | गढ़वाल , अल्मोड़ा और नैनीताल जिलो का प्रशासन कुमाउं क्षेत्र का कमिश्नर संभालता था | सन 1960 में गढ़वाल जिले से काटकर “चमोली” नाम का एक जिला बनाया गया | 1969 में गढ़वाल डिवीज़न का केंद्र बना और इसका मुख्यालय “पौड़ी” को बनाया गया | 1998 में पौड़ी जिले से खिरसू ब्लाक से 72 गांवो को अलग करके एक नया जिले “रुद्रप्रयाग” का गठन किया |

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इस तरह से “पौड़ी” जिले ने अपना आधुनिक रूप लिया |

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ऋषिकेश की मान्यताये (Beliefs of Rishikesh) !

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित “ऋषिकेश अर्थात ऋषिकेश की मान्यताये” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप ऋषिकेश की मान्यताये के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !

ऋषिकेश की मान्यताये के बारे में जानने से पहले निचे दिए गए लिंक में क्लिक करके आप ऋषिकेश के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते है !

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[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’ऋषिकेश का इतिहास ! (History of Rishikesh)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-of-rishikesh/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#358be8′ custom_content=” color=” custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

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ऋषिकेश की मान्यताये ! ( Beliefs of Rishikesh)

1. ऋषिकेश में बहुत प्राचीन मंदिर और आश्रम है | जिनका यहाँ धार्मिक महत्व है ( ऋषिकेश की मान्यताये )  | ऋषिकेश को योग की राजधानी कहा जाता है क्यूंकि   ऋषिकेश में योग और ध्यान का  प्रशिक्षण होता है | हिन्दू साधू-संत ऋषिकेश में रहकर, योग और ध्यान में मग्न रहते है ताकि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके |
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2. ऋषिकेश से 22 किमी. की दूरी पर 3000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथकेदारना मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। और यह कहा जाता है कि यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था।

ऋषिकेश की मान्यताओ के साथ साथ ऋषिकेश के इतिहास !  के बारे में भी जानकारी प्राप्त करे |

ऋषिकेश में स्थित “लक्ष्मण झूला”

गंगा नदी के एक किनारे को दूसरे किनारे से जोड़ता “लक्ष्मण झूला” इस नगर की विशिष्ट पहचान है। इसे 1939 में बनवाया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था | ( ऋषिकेश की मान्यताये )

3. ऋषिकेश में स्नान करने के लिए त्रिवेणी प्रमुख घाट है | इस स्थान में प्रात: काल से ही अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं । कहा जाता है कि इस स्थान पर हिन्दू धर्म की तीन प्रमुख नदियों ( गंगा , यमुना और सरस्वती ) का संगम होता है । इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है।

4. ऋषिकेश में स्थित गंगा नदी में डुबकी या स्नान करने से ऐसा कहा जाता है कि डुबकी या स्नान लगाने से सारे पाप धुल जाते है और आत्मा की शुद्धी होती है |

उम्मीद करते है कि आपको ऋषिकेश की मान्यताओ  के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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ऋषिकेश का इतिहास ! (History of Rishikesh)

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 ऋषिकेश का इतिहास

(History of Rishikesh)

” ऋषिकेश “ भारत के उत्तराखंड राज्य के देहरादून जिले में स्थित है | ( ऋषिकेश का इतिहास )

ऋषिकेश गढ़वाल हिमालय पर्वत की तलहटी में समुन्द्रतल से 409 मीटर की ऊँचाई पर स्थित और शिवालिक रेंज से घिरा हुआ है | हिमालय की पहाड़िया और प्राकर्तिक सौन्दर्यता से ही इस धार्मिक स्थान से बहती गंगा नदी ऋषिकेश को अतुल्य बनाती है | ऋषिकेश का शांत वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है | हर साल ऋषिकेश के आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शांति के लिए आते है |

वशिष्ठ गुफा , लक्ष्मण झूला और नीलकंठ मंदिर आदि ऋषिकेश के प्रमुख पर्यटन स्थल है |

ऋषिकेश दो शब्दों के संयोजन से बना है , “ऋषिक” और “एश” | “ऋषिक” का अर्थ है “इन्द्रिया” और “एश” का अर्थ है “भगवान या गुरु” |

स्वतंत्रता के बाद ऋषिकेश को पवित्र हिन्दू शहर के रूप में घोषित कर दिया गया |
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सन 1960 के दशक में “बीटल्स” ऋषिकेश के पास योग का अध्यन करने के लिए आया था | तब से इस शहर ने खुद को  “दुनिया की योग राजधानी”  कहा है | ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है।
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पौराणिक कथा ऋषिकेश:-

ऋषिकेश में एक प्रसिद्ध “संत रिहाना रिशी” का निवास स्थान था | उन्होंने गंगा नदी के किनारे तपस्या करी | जिसके कारण इनाम स्वरुप भगवान विष्णु “ऋषिकेश” के रूप में संत रिहाना रिशी के समक्ष उपस्थित हुए |

इस वजह से इस स्थान को ऋषिकेश का नाम दिया |

यह भी माना जाता है कि ऋषिकेश पौराणिक “केदारखंड” का भाग है |

ऋषिकेश के समीप “हरिद्वार का इतिहास ” जानने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे |

हरिद्वार का इतिहास !

इस स्थान में भगवान राम ने रावण को मारने के लिए घोर तपस्या करी थी | श्री राम के भाई लक्ष्मण ने गंगा नदी को एक विशेष बिंदु पर पार करा था | जो की “ लक्षमण झुला ” के नाम से जाना जाता है |

दूसरी कहानी कहती है कि “भरत” भगवान राम के भाई ने इस स्थान पर तपस्या की , जिसके बाद ऋषिकेश में “भरत मंदिर” बनाया गया |  ( ऋषिकेश का इतिहास )

और यह भी कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकला विष “भगवान शिव” ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें “नीलकंठ” के नाम से जाना गया। और इसी कारण ऋषिकेश में भगवान शिव की महिमा की वजह से “नीलकंठ मंदिर” स्थापित किया गया |

हालांकि एक प्रसिद्ध धार्मिक गुरु आदि शंकराचार्य के बाद , 9 वी शताब्दी में इस जगह का दौरा किया और बाद में ऋषिकेश ने धार्मिक स्थान के रूप में प्रमुखता प्राप्त कर ली |

ऋषिकेश का इतिहास पढने के साथ-साथ  “ऋषिकेश की मान्यताओ” के बारे में भी जरुर जाने |

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हरिद्वार की मान्यताये ! (Beliefs of Haridwar)

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हरिद्वार की मान्यताये

(Beliefs of Haridwar)

हरिद्वार की मान्यताये उत्तराखंड की पहाडियों के बीच बसा “हरिद्वार” सुंदर, आस्था से भरा धार्मिक शहर है | यह पवित्र शहर भारत के सात पवित्र शहरो “सप्तपुरी” में से एक है | हरिद्वार को “माता सती” का घर भी कहा जाता है | इसे गंगाद्वार , मायापुरी ,  कपिलास्थान , मोक्षद्वार आदि नाम से भी जानते है | इस जगह का इतिहास राजा विक्रमादित्य के समय से मौजूद है | इस शहर का उल्लेख कई प्राचीन हिंदू महाकाव्यों में मिलता है | यहाँ स्थित अधिकतर धार्मिक स्थल पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित हैं ।

हरिद्वार की मान्यताये 

 हिन्दू धर्म में यह अटूट मान्यता है कि गंगा नदी में स्नान करने से प्राणी मात्र के समस्त पाप कर्म दूर हो जाते है | साथ ही साथ आत्मा भी पवित्र हो जाती है |

कुम्भ मेला क्यों मनाया जाता है ?

पौराणिक कथा के अनुसार समुन्द्रमंथन के वक़्त एक अमृत कलश प्रकट हुआ | इस अमृत कलश को स्वर्ग तक ले जाने की जिम्मेदारी श्री हरी विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ को दी |
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जब गरुड़ अमृत से भरे कलश को लेकर जा रहे होते है | तब अमृत के कलश से कुछ बुँदे छलक कर गिर जाती है | अमृत की बुँदे धरती के चार अलग स्थानों पर गिरती है | जो उज्जैन , नासिक , प्रयाग , हरिद्वार थे | इसी कारण चार जगहों पर “कुम्भ मेला ” आयोजित किया जाता है |

हरिद्वार ही वह पवित्र स्थान है | जहः वंशजो की पूरी वंशावली (जानकारी) प्राप्त हो जायेगी | क्युकी प्राचीन रिवाजों के अनुसार हिन्दू परिवारों के कई पीढियों की विस्तृत जानकारी हरिद्वार पंडितो के पास हज़ारो वर्ष से सहजे (संभाली) होती है |स्थानीय ब्राह्मण पंडितो को (पंडा) कहा जाता है |

हरिद्वार की मान्यताओ के साथ हरिद्वार के इतिहास के बारे में भी जरुर जाने |

हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार कोई व्यक्ति जीवित रहकर हरिद्वार जाए ना जाए मगर मृत्यु के बाद उसकी अस्थियो का विसर्जन हरिद्वार में ही होता है |

 हरिद्वार की मान्यताये  के अनुसार हरिद्वार में स्थित “हर की पौड़ी” को अति पवित्र माना जाता है | यह कहा जाता है कि देवी गंगा के अनुरोध करने पर स्वयं भगवान् विष्णु ने अपने पैरों के चिन्ह (जिन्हें पदचिन्ह कहा जाता है) | यहाँ हर की पौड़ी में छोड़े थे | आज भी पदचिन्ह “हर की पौड़ी में विद्यमान , विराजमान है | ( हरिद्वार की मान्यताये )

हरिद्वार में “हर की पौड़ी” पर की जाने वाली गंगा आरती विशेष आरती कहलाती है | यह गंगा आरती पुरे विश्व में प्रसिद्ध है |

हिन्दू शास्त्रों धर्म के अनुसार गंगा के तट पर (पिंड दान) करने से पितरो की आत्मा को शान्ति की प्राप्ति होती है | तथा गंगा के तट पर ही मुंडन भी संपन्न किये जाते है |

शिवरात्री के लिए शिवभक्त “कावड़ियो” की यात्रा भी गंगा तट से आरम्भ होती है |कावड़िये गंगा का शुद्ध जल गंगा के तट से ले जाकर शिवलिंग में चढाते है | इसलिए हरिद्वार को भारत के प्रमुख पवित्र तीर्थ स्थलों में एक माना जाता है |

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हरिद्वार का इतिहास (History of Haridwar) !!

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित “हरिद्वार अर्थात हरिद्वार का इतिहास” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप हरिद्वार के इतिहास के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !

हरिद्वार के इतिहास  के बारे में जानने से पहले निचे दिए गए लिंक में क्लिक करके आप हरिद्वार की मान्यताओ के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते है !




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हरिद्वार का इतिहास

(History of Haridwar)

हरिद्वार का इतिहास  बहुत ही पुराना और रहस्य से भरा हुआ है | “हरिद्वार” उत्तराखंड में स्थित भारत के सात सबसे पवित्र स्थलों में से एक है | यह बहुत प्राचीन नगरी है और उत्तरी भारत में स्थित है | हरिद्वार उत्तराखंड के चार पवित्र चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार भी है | यह भगवान शिव की भूमि और भगवान विष्णु की भूमि भी है। इसे सत्ता की भूमि के रूप में भी जाना जाता है | मायापुरी शहर को मायापुरी, गंगाद्वार और कपिलास्थान नाम से भी मान्यता प्राप्त है और वास्तव में इसका नाम “गेटवे ऑफ़ द गॉड्स” है । यह पवित्र शहर भारत की जटिल संस्कृति और प्राचीन सभ्यता का खजाना है | हरिद्वार शिवालिक पहाडियों के कोड में बसा हुआ है |

पवित्र गंगा नदी के किनारे बसे हरिद्वार” का शाब्दिक अर्थ “हरी तक पहुचने का द्वार” है |

हरिद्वार चार प्रमुख स्थलों का प्रवेश द्वार भी है | हिन्दू धर्मं के अनुयायी का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है | प्रसिद्ध तीर्थ स्थान “बद्रीनारायण” तथा “केदारनाथ” धाम “भगवान विष्णु” एवम् “भगवान शिव “ के तीर्थ स्थान का रास्ता (मार्ग) हरिद्वार से ही जाता है | इसलिए इस जगह को “हरिद्वार” तथा “हरद्वार” दोनों ही नामों से संबोधित किया जाता है |

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महाभारत के समय में हरिद्वार को “गंगाद्वार” नाम से वयक्त किया गया है | ( हरिद्वार का इतिहास )

हरिद्वार का प्राचीन पौराणिक नाम “माया” या “मायापुरी” है | जिसकी सप्तमोक्षदायिनी पुरियो में गिनती की जाती है | हरिद्वार का एक भाग आज भी “मायापुरी” के नाम से प्रसिद्ध है | यह भी कहा जाता है कि पौराणिक समय में समुन्द्र मंथन में अमृत की कुछ बुँदे हरिद्वार में गिर गयी थी | इसी कारण हरिद्वार में “कुम्भ का मेला” आयोजित किया जाता है | बारह वर्ष में मनाये जाने वाला “कुम्भ के मेले ” का हरिद्वार एक महत्वपूर्ण स्थान है |


हरिद्वार के इतिहास  के बारे में यह भी कहा जाता है कि इस स्थान पर ऋषि कपिल मुनि ने तपस्या की थी | इसलिए हरिद्वार को “कपिलास्थान” नाम से संबोधित किया जाता है |
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हरिद्वार को ” हर की पौड़ी ” क्यों कहा जाता है और इसका महत्व क्या है ?

हरिद्वार को हमेशा से ही ऋषियों की तपस्या करने के स्थान के रूप में माना जाता रहा है | राजा धृतराष्ट्र के मंत्री विदुर ने मंत्री मुनि के स्थान पर ही अध्यन किया था |राजा स्वेत ने “हर की पौड़ी” में भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की | जिससे भगवान ब्रह्मा तपस्या को देखकर खुश हुए और राजा स्वेत से वरदान मांगने को कहा | राजा ने वरदान में यह माँगा कि “हर की पौड़ी” को ईश्वर के नाम से जाना जाए | तब से “हर की पौड़ी” के पानी को “ब्रह्मकुंड” के नाम से जाना जाता है | हरिद्वार अपने आप में रोचक एवम् रहस्यभरी जगह है | इस जगह पर हर व्यक्ति का लिखा हुआ इतिहास ज्ञात हो जाता है |अपने पूर्वजो की जानकारी , वंशावली का पता करना , हो तो सिर्फ हरिद्वार ही एक मात्र ऐसा स्थान है | जो कि यह सब जानकारी प्राप्त करने में मदद कर सके | ( हरिद्वार का इतिहास )
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हरिद्वार में “हर की पौड़ी” नामक एक घाट है | घाट को “हर की पौड़ी” नाम से इसलिए बुलाया जाता है क्यूंकि इस जगह पर भगवान श्री हरी आये थे और इस स्थान पर उनके चरण पड़े थे | यह जगह उन लोगों के लिए आदर्श तीर्थ स्थान है, जो मृत्यु और इच्छा की मुक्ति के बारे में चिंतित हैं।

गंगा नदी को किस कारण धरती पर लाया गया 

राजा सागर के वंशज राजा ने अपने पुरखो के उद्धार के लिए कठिन तपस्या की तथा माँ गंगा को धरती पर लाये | स्वर्ग से उतरकर माँ गंगा भगवान शिव जी की जटाओ से होते राजा भागीरथ के पीछे पीछे चल दी | जब राजा भागीरथ गंगा नदी को लेकर हरिद्वार पहुचे तो सागर पौत्रों के भस्म हुए अवशेषो को गंगा के स्पर्श मात्र से मोक्ष प्राप्त हो गया | उस समय से हरिद्वार में अस्थि विसर्जन की परम्परा चलती आ रही है |

और यदि आप और विस्तार से जानना चाहते है कि गंगा नदी को किस कारण धरती पर लाया गया |

जरुर पढ़े :- गंगा नदी के धरती में प्रवाह की कहानी |

इस जगह पर साल भर श्रद्धालु गंगा नदी में दुबकी लगाने और अपने पापो का नाश करने के लिए आते जाते रहते है |



उम्मीद करते है कि आपको “हरिद्वार के इतिहास” के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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केदारनाथ धाम की मान्यताये ! (Beliefs of Kedarnath Dham)

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित प्रसिद्ध चार धाम में से एक धाम “केदारनाथ धाम अर्थात केदारनाथ धाम की मान्यताये” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप केदारनाथ धाम की मान्यताओं के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

अन्य धामो के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे !

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[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’गंगोत्री धाम का इतिहास ! (History of Gangotri Dham , Uttarakhand)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-of-gangotri-dham-uttarakhand/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#4c97e8′ custom_content=” color=” custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

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केदारनाथ धाम की मान्यताये (Beliefs of Kedarnath Dham)

1. केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है | जो कटवा पत्थरो के विशाल शिलाखंडो को जोड़कर बनाया गया है | इन शिलाखंड का रंग भूरा होता है |इसका गर्भगृह अत्यंत पुराना है , जिसे 80वी शताब्दी के लगभग का माना जाता है |

2. यह धाम चार धाम यात्रा का तीसरा पडाव है | केदारनाथ मंदिर की मान्यता यह भी है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है | उसकी यात्रा निष्फल (अधूरी,व्यर्थ) हो जाती है |

केदारनाथ धाम की मान्यताओं  के साथ साथ आपको केदारनाथ धाम के इतिहास! के बारे में जरुर पढना चाहिए |

3. इस मंदिर के निर्माण के बारे में अनेक लोगो की अलग अलग कहानी है | राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये मंदिर 12-13 शताब्दी का है | इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल मानते है कि शैव लोग आदिगुरु शंकराचार्य से पहले केदारनाथ जाते रहे है | यह माना जाता है कि 1000 वर्ष से केदारनाथ मंदिर में तीर्थयात्रा जारी है | यह भी कहते है कि केदारेश्वर ज्योतिलिंग के प्राचीन मंदिर का निर्माण पांडवो ने कराया था | 
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बाद में अभिमन्यु के पुत्र जन्मेजय ने इसका जीर्णोद्धार ( पुनःनिर्माण ) किया था |लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है वो है कि सतयुग में शासन करने वाले राजा केदार के नाम पर इस स्थान का नाम केदार पड़ा |

4. केदारनाथ धाम की मान्‍यताओं  के दर्पण में केदारनाथ: लिंग पुराण के मतानुसार जो मनुष्य संन्यास लेकर केदारकुण्ड में निवास करता है, वह शिव समान हो जाता है |

कर्मपुराण में कहा गया है कि  महालय तीर्थ में स्नान करने और केदारनाथ का तीर्थ करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है |

पह्म पुराण में कहा गया है कि  “जब कुंभ राशि पर सूर्य तथा गुरु ग्रह स्थित हो, तब केदारनाथ का दर्शन तथा स्पर्श मोक्ष प्रदान करता है”

हमारे सनातन धर्म में एक विशेष महापुराण है स्कंद पुराण, इसमें भी केदारनाथ का महात्म्य बताया गया है |

5. केदारनाथ मंदिर के बारे में शिवपुराण में कहा गया है कि केदारनाथ में जो तीर्थयात्री आते है | उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और अपने सभी पापो से मुक्त भी हो जाते है | केदारनाथ के जल को अत्यंत धार्मिक महत्व दिया जाता है क्यूंकि लोगो का कहना है यदि मंदिर में कोई व्यक्ति अपनी प्रार्थना के बाद पानी  है | तो उस व्यक्ति को अपने सभी पापो से मुक्ति मिल जायेगी |

6. केदारनाथ मंदिर की मान्यता   यह है कि केदारनाथ भगवान शिव के बारह ज्योतिलिंगो में से एक है | “केदारनाथ धाम में ज्योतिलिंगो के दर्शन” की बड़ी मान्यता है | इस स्थान के बारे में यह माना जाता है कि ज्योतिलिंग के दर्शन से समस्त पापो से मुक्ति मिल जाती है |


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