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गंगोत्री धाम की मान्यताये (Beliefs of Gangotri Dham) !!

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित प्रसिद्ध चार धामों में से एक धाम “गंगोत्री धाम अर्थात गंगोत्री धाम की मान्यताओ” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप गंगोत्री धाम की मान्यताओ के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

अन्य धामों के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे !

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गंगोत्री धाम की मान्यताये ! (Beliefs of Gangotri Dham)

उत्तराखंड प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों और देवताओ के स्थलों का धाम है |  हिन्दुओ के धर्म ग्रन्थ के अनुसार यमुनोत्री , गंगोत्री , केदारनाथ और बद्रीनाथ हिन्दुओ की सबसे प्राचीन एवम् धार्मिक स्थान रहा है | हिन्दू धर्म की मान्यताओ के अनुसार चारधाम यात्रा के दर्शन करने से जीवन-मरण एवम् पाप से मुक्ति की प्राप्ति होती है | ऐसे मे आज इस पोस्ट में हम आपको “गंगोत्री धाम” जो कि चार धाम यात्रा का दूसरा पडाव है |उसके सम्बन्ध में “गंगोत्री धाम की मान्यताओं” से अवगत कराने वाले है |

गंगोत्री धाम की मान्यताये :-

1. चार धाम यात्रा में गंगोत्री धाम के बारे में यह मान्यता है कि स्वर्ग से उतरकर देवी गंगा ने सर्वप्रथम गंगोत्री में ही धरती का स्पर्श किया था ।

2. गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर गोमुख स्थित है | यह गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना है | इस जगह के बारे में यह कहते है कि इस जगह के बर्फीले जल में स्नान करने से पाप धुल जाते है |

3. गंगोत्री धाम की मान्यता  यह भी है कि पांडवों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान किया था। जिससे की युद्ध में मारे गए परिजनों को मुक्ति मिल सके |
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गंगोत्री धाम की मान्यताये के साथ साथ गंगोत्री धाम के इतिहास ! के बारे में पढने के लिए लिंक में क्लिक कर जरुर पढ़े |

गोत्री धाम में गंगा नदी के प्रवाह की कहानी :-

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भारतवर्ष में राजा महाराज सागर का राज था और उनके 60,000 पुत्र थे | मान्यता के अनुसार राजा को अश्व्मेध यज्ञ करवाना था | इसमें उनका घोडा जहा जहा गया | उनके 60,000 बेटो ने उन जगहों को अपने आधिपत्य में लेते गए | इससे देवताओं के राजा इंद्र चिंतित हो गए | तो ऐसे में उन्होंने घोड़े को पकड़कर कपिल मुनि के आश्रम में बाध दिया | राजा सागर के बेटो ने घोड़े को ऋषि मुनि के आश्रम में बधा हुआ देखा | तो राजा सागर के बेटो ने मुनिवर का अनादर करते हुए घोड़े को छुड़ा ले गए |

जिससे क्रोधित महर्षि ने शाप देकर उन्हें भष्म कर दिया व उनकी आत्मा मोक्ष से वंचित रह गयी। महाराज की कई बार विनती करने के पश्चात महर्षि ने उन्हे कहा कि शाप तो वापस नहीं लिया जा सकता है , लेकिन उपाय किया जा सकता है। उन्होने महाराजा सागर को बताया कि यदि स्वर्ग से दिव्य नदी गंगा को धरती पर लाया जाये तो उनके पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। इसके बाद उन्होने अपनी कड़ी तपस्या करी और दिव्य गंगा माँ को धरती पर ले आए। गंगा के प्रचंड स्वरूप के कारण विनाश से धरती को बचाने के लिए भगवान शिव ने गंगा को पहले अपनी जटा में धारण करा फिर धरती की ओर प्रवाहित किया।

5. गंगोत्री धाम से गंगा नदी का जल केदरनाथ में भगवान शिव के समक्ष पेश किया जाता है | गंगा नदी का जल बद्रीनाथ धाम में श्रद्धा समारोह के दौरान प्रयोग किया जाता है | गंगोत्री के पानी को सभी श्रधालु घर ले जाते है और सभी को प्रसाद के रूप में बाटते है |( गंगोत्री धाम की मान्यताये ! )

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यमुनोत्री धाम की मान्यताये ! (Beliefs of Yamunotri Dham, Uttarakhand)

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित प्रसिद्ध धाम ” यमुनोत्री धाम अर्थात यमुनोत्री धाम की मान्यताये “ के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप यमुनोत्री धाम की मान्यताये के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !

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यमुनोत्री धाम की मान्यताये  (Beliefs of Yamunotri Dham) 

यमुनोत्री धाम चार धाम यात्रा का सर्वप्रथम पडाव है | यह उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बरकोट से करीब 40 किलोमीटर दूर गढ़वाल हिमालय में स्थित है |

यमुनोत्री धाम की मान्यताओ  में से जो प्रमुख मान्यता है वो निचे निम्न है :-

1. हिन्दू धर्म के अनुसार यमुना नदी को अति पवित्र नदियों में से एक माना जाता है |

2. यमुनोत्री धाम की मान्यताओं  के अनुसार हिन्दू मान्यता में देवी यमुना और यम (मृत्यु देवता) भगवान सूर्य और देवी संध्या की दो संताने थी।

यमुनोत्री धाम में स्थित यमुना जल पवित्र क्यों माना जाता है ?

यमुनोत्री धाम की मान्यता  यह है कि देवी संध्या , सूर्य की भीषण गर्मी को सहन नहीं कर पा रही थी | तत्पश्चात यम ने “छाया” नाम का पुतला बनाकर उसको जगह दे दी। एक दिन यम ने छाया को अपने पैर से मारने की कोशिश की तो क्रोधित “छाया” ने यम को अभिशाप दिया कि तुम्हारा पैर एक दिन गिर जाएगा।
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यमुना ने अपने भाई यम से वरदान के रूप में नदियों के सुरक्षित जल की मांग की, जिससे किसी की पानी पीने के अभाव के कारण मृत्यु न हो व मोक्ष (स्वर्ग) की प्राप्ति हो इसलिए यमुनोत्री धाम उद्गम स्थल के निकट स्थित पर्वत का नाम भगवान सूर्य के नाम पर रखा गया है | जिन्हें कलिंदा भी कहते हैं।

यमुना नदी के जल की मान्यता यह है कि यमुनोत्री धाम से यमुना नदी का एकत्रित जल को घर में छीटे मारने से वास्तु दोषों से मुक्ति मिल जाती है |

और ऐसा भी कहा जाता है की जो कोई भी माँ यमुना के जल मे स्नान करता है वह आकाल म्रत्यु के भय से मुक्त होता है और मोक्ष (स्वर्ग) प्राप्त करता है |

यमुनोत्री धाम की मान्यताओ   के साथ साथ यमुनोत्री धाम का इतिहास  के बारे मे भी जरुर जाने |

यमुनोत्री धाम में स्थित “सूर्यकुंड”  

प्रसिद्ध सूर्यकुंड के बारे में यह कहा जाता है कि बेटी (यमुना) को आशीर्वाद देने के लिए भगवान सूर्य ने गर्म जलधारा का रूप धारण किया | श्रद्धालु सूर्यकुंड में चावल और आलू को कपडे में बांधकर कुछ समय तक छोड़ देते है | जिससे चावल और आलू पक जाता है | यात्री इस पके हुए चावल और आलू को प्रसाद स्वरुप अपने साथ ले जाते है | यह माना जाता है कि प्रसाद में यमुना देवी की कृपा समाहित हो जाती है |

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केदारनाथ धाम का इतिहास ! (History of Kedarnath Dham , Uttarakhand)

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित प्रसिद्ध धाम ” केदारनाथ धाम अर्थात केदारनाथ धाम के इतिहास “ के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप केदारनाथ धाम के इतिहास के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !

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केदारनाथ धाम का इतिहास ! (History of Kedarnath Dham)

केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। ( केदारनाथ धाम का इतिहास ! )

उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है |

यह उत्तराखंड का सबसे विशाल शिव मंदिर है, जो कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। ये शिलाखंड भूरे रंग की हैं। मंदिर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसका गर्भगृह प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है ।

केदारनाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ, दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड।

केदारनाथ मंदिर न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी ।

इन नदियों में से कुछ का अब अस्तित्व नहीं रहा लेकिन अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है।
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केदारनाथ धाम के इतिहास  के साथ साथ केदारनाथ धाम की मान्यताये को भी जरुर पढ़े |

केदारनाथ धाम के इतिहास के अनुसार  केदारनाथ मंदिर में स्थित शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है |  जयोतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही समस्त पापो से मुक्ति मिल जाती है |

केदारनाथ मंदिर के किनारे मे केदारेश्वर धाम स्थित है | पत्थरो से बने कत्य्रुई शैली से बने केदारनाथ मंदिर के इतिहास  के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडव वंश के जन्मेजय ने कराया था | लेकिन ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरू शंकराचार्य ने की | केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते है | ( केदारनाथ धाम का इतिहास ! )

यदि आप केदारनाथ धाम से पहले पड़ने वाले धाम का इतिहास जानना चाहते है तो निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे |

 यमनोत्री धाम का इतिहास !

श्री केदारनाथ मंदिर में शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजे जाते है | शिव की भूजाए तुंगनाथ में , मुख रुद्रनाथ में , नाभि मदम्देश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए | इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को “पंचकेदार” कहा जाता है |

यहाँ शिवजी के भव्य मंदिर बने है | ( केदारनाथ धाम का इतिहास ! )
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केदारनाथ धाम के बारे में कथा ! (Story about Kedarnath Dham)

केदारनाथ मंदिर के ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास :-

हिमालय के केदार पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

पंचकेदार (केदारनाथ) की कथा 

ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या अर्थात (परिवार वालो की हत्या) के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे | लेकिन भगवान शंकर पांडवो से गुस्सा थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए , पर भगवान शंकर पांडवो को वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे । भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए।

और यदि आप चार धाम यात्रा के दुसरे पडाव का इतिहास  पढना चाहते है तो निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे :-

गंगोत्री धाम का इतिहास !

भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण करके अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था कि भगवान शंकर इन पशुओ के झुण्ड में उपस्थित है । तभी भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए ।

अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल का रूप धारण कर पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। तब भीम पूरी ताकत से बैल पर झपटे , लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान करने लगा। तब भीम ने बैल का पीठ का भाग पकड़ लिया। और भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तुरंत दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ धाम में पूजे जाते हैं। ( केदारनाथ धाम का इतिहास ! )

इसलिए केदारनाथ धाम में शिवजी को अत्यंत पूजा जाता है |

और यदि आप चार धाम यात्रा के अंतिम पडाव का इतिहास पढना चाहते है तो निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे :-

बद्रीनाथ धाम का इतिहास !

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गंगोत्री धाम का इतिहास ! (History of Gangotri Dham , Uttarakhand)

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गंगोत्री धाम का इतिहास ! (History of Gangotri Dham)

“गंगोत्री मंदिर” भारत के राज्य उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से 100 km की दुरी पर स्थित है | पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार धरती पर मां गंगा का जिस स्‍थान पर अवतरण हुई , उसे “गंगोत्री तीर्थ” के नाम से जाना जाता है | गंगोत्री उत्तराखंड राज्य में स्थित गंगा नदी के उद्गम के रूप में माना जाता है | ( गंगोत्री धाम का इतिहास )

यह चार धाम यात्रा का दूसरा पवित्र पड़ाव है , जो कि यमुनोत्री धाम के बाद आता है |

गंगोत्री मंदिर हिन्दुओ का एक पवित्र व तीर्थ स्थान है | गंगोत्री मंदिर भागीरथी नदी के तट पर स्थित है |

यह मंदिर 3100 मीटर (10,200 फीट) की ऊँचाई पर ग्रेटर हिमालय रेंज पर स्थित है | यह स्थान गंगा नदी का उद्गम स्थल है | गंगोत्री मंदिर भारत का सबसे प्रमुख मंदिर है |

गंगोत्री में गंगा का उद्गम स्रोत यहाँ से लगभग 24 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर में 4,225 मीटर की ऊँचाई पर होने का अनुमान है |

गंगा का मन्दिर तथा सूर्य, विष्णु और ब्रह्मकुण्ड आदि पवित्र स्थल यहीं पर हैं |

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पौराणिक कथा के अनुसार :-

भगवान श्री राम चन्द्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी।गंगोत्री धाम के इतिहास  के अनुसार “देवी गंगा” ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया।

अन्य मान्यता यह है कि पांडवों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था। ( गंगोत्री धाम का इतिहास ! )

गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर, समुद्रतल से तकरीबन 3,892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है “गौमुख” । यह गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है । कहते हैं कि यहां के बर्फिले पानी में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं।

चार धाम यात्रा के अन्य तीन धाम का इतिहास जानने के लिए निचे दिए गए link में क्लिक करे :-

यमुनोत्री धाम का इतिहास !

बद्रीनाथ धाम का इतिहास !

केदारनाथ धाम का इतिहास !

पवित्र शिलाखंड के पास ही 18वीं शताब्दी में गंगोत्री मंदिर का निर्माण  किया गया।

गंगोत्री धाम के इतिहास  के साथ-साथ गंगोत्री धाम की मान्यतायो  को भी जरुर पढ़े|

इस जगह पर शंकराचार्य ने गंगा देवी की एक मूर्ति स्थापित की थी। जहां इस मूर्ति की स्थापना हुई थी | वहां गंगोत्री मंदिर का निर्माण  गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा 18वी शताब्दी में किया गया था | मंदिर में प्रबंध के लिए सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया । इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे।

गंगोत्री धाम का इतिहास  यह भी है कि जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने 20वीं सदी में मंदिर की मरम्मत करवायी। और वर्तमान समय में गंगोत्री मन्दिर का पुनःनिर्माण  जयपुर राजघराने के राजा माधो सिंह ने बींसवी शताब्दी में करवाया था |

गंगोत्री मंदिर उत्कर्ष्ठ सफ़ेद ग्रेनाइट के चमकदार 20 फीट उन्शे पठारों से निर्मित है |शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। यह दृश्य अत्यधिक मनोहार एवं आकर्षक है | यहां शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न रहती है।

नैसर्गिक चट्टान के दर्शन से दैवीय शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है | गंगोत्री मंदिर के समीप शाम होते ही जब गंगा नदी का स्तर कम हो जाता है | उस समय पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते है जो की गंगोत्री नदी में जलमग्न है |

गंगोत्री मंदिर की पौराणिक कथा  के अनुसार भगवान शिवजी इस जगह में अपनी जताओ को फैला कर बैठ गए और उन्होंने गंगा माता को अपनी घुंघराली जताओ में लपेट दिया | ( गंगोत्री धाम का इतिहास ! )

प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर के महीने के बीच पवित्र पावनी गंगा मैया के दर्शन करने के लिए लाखो श्रद्धालु इस चार धाम में से गंगोत्री के दर्शन करने के लिए आते है |

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यमुनोत्री धाम का इतिहास ! (History of Yamunotri Dham , Uttarakhand)

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य में स्थित प्रसिद्ध धामयमुनोत्री धाम अर्थात यमुनोत्री धाम का इतिहास  के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप यमुनोत्री धाम के इतिहास  के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !
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यमुनोत्री धाम का इतिहास ! (History of Yamunotri Dham)

हिमालय की पर्वत श्रंख्लायो में बसा ” यमुनोत्री धाम ” हिन्दुओ के चार धामों में से एक है | (यमुनोत्री धाम का इतिहास) 

यमुनोत्री मंदिर गढ़वाल हिमालय के पश्चिम में समुद्र तल से 3235 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है | यह मंदिर चार धाम यात्रा का पहला धाम अर्थात यात्रा की शुरूआत इस स्थान से होती है तथा यह चार धाम यात्रा का यह पहला पड़ाव है । यमुनोत्री धाम का इतिहास यानी मंदिर का निर्माण  टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रतापशाह ने  सन 1919 में देवी यमुना को समर्पित करते हुए बनवाया था |

यमुनोत्री मंदिर भुकम्प से एक बार पूरी तरह से विध्वंस हो चुका है |

और इस मंदिर का पुनः निर्माण  जयपुर की “महारानी गुलेरिया” के द्वारा 19वीं सदी में करवाया गया था।

यमुनोत्री का वास्तविक स्रोत जमी हुयी बर्फ की एक झील और हिमनंद (चंपासर ग्लेशियर) है |

जो समुन्द्र तल से 4421 मीटर की ऊँचाई पर कालिंद पर्वत पर स्थित है |
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मंदिर के मुख्य कर्व गृह में माँ यमुना की काले संगमरमर की मूर्ति विराजत है |इस मंदिर में यमुनोत्री जी की पूजा पुरे विधि विधान के साथ की जाती है | यमुनोत्री धाम में पिंड दान का विशेष महत्व है | श्रद्धालु इस मंदिर के परिसर में अपने पितरो का पिंड दान करते है | (यमुनोत्री धाम का इतिहास )

यमुनोत्री धाम के इतिहास  के साथ यमुनोत्री धाम की मान्यताओ के बारे में भी जरुर जाने |

पौराणिक गाथाओ के अनुसार :-

यमुना नदी सूर्य देव की पुत्री है और मृत्यु के देवता यम की बहन है | कहते है कि भैयादूज के दिन जो भी व्यक्ति यमुना में स्नान करता है |उसे यमत्रास से मुक्ति मिल जाती है | इस मंदिर में यम की पूजा का भी विधान है |

यमुनोत्री धाम के इतिहास  का वर्णन हिन्दुओं के वेद-पुराणों में भी किया गया है , जैसे :- कूर्मपुराण, केदारखण्ड, ऋग्वेद, ब्रह्मांड पुराण मे , तभी यमुनोत्री को ‘‘यमुना प्रभव’’ तीर्थ कहा गया है।

और यह भी कहा जाता है कि इस स्थान पर “संत असित” का आश्रम था |

महाभारत के अनुसार जब पाण्डव उत्तराखंड की तीर्थयात्रा मे आए | तो वे पहले यमुनोत्री , तब गंगोत्री फिर केदारनाथ-बद्रीनाथजी की ओर बढ़े थे, तभी से उत्तराखंड में चार धाम यात्रा की जाती है।

और चारधाम यात्रा के  बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये !  के बारे में जरुर जाने |

प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर के महीनो के बीच पतित पावनी यमुना देवी के दर्शन करने के लिए लाखो श्रद्धालु व तीर्थयात्री इस स्थान में आते है।

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बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! History and beliefs of Badrinath Temple

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बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास ! (History of Badrinath Temple)

बद्रीनाथ या बद्रीनारायण मंदिर एक हिन्दू मंदिर है |  ( बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! )

यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है , ये मंदिर भारत में उत्तराखंड में बद्रीनाथ शहर में स्थित है |

बद्रीनाथ मंदिर , चारधाम और छोटा चारधाम तीर्थ स्थलों में से एक है |
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यह अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है । ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं | यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है | ऋषिकेश से यह 214 किलोमीटर की दुरी पर उत्तर दिशा में स्थित है | बद्रीनाथ मंदिर शहर में मुख्य आकर्षण है | प्राचीन शैली में बना भगवान विष्णु का यह मंदिर बेहद विशाल है | इसकी ऊँचाई करीब 15 मीटर है | पौराणिक कथा के अनुसार , भगवान शंकर ने बद्रीनारायण की छवि एक काले पत्थर पर शालिग्राम के पत्थर के ऊपर अलकनंदा नदी में खोजी थी | वह मूल रूप से तप्त कुंड हॉट स्प्रिंग्स के पास एक गुफा में बना हुआ था |
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बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण (Establishment of Badrinath temple)

सोलहवीं सदी में गढ़वाल के राजा ने मूर्ति को उठवाकर वर्तमान बद्रीनाथ मंदिर में ले जाकर उसकी स्थापना करवा दी |

और यह भी माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने 8 वी सदी में मंदिर का निर्माण करवाया था |

शंकराचार्य की व्यवस्था के अनुसार मंदिर का पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है |

यहाँ भगवान विष्णु का विशाल मंदिर है और पूरा मंदिर प्रकर्ति की गोद में स्थित है |
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यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप ।बद्रीनाथ जी के मंदिर के अन्दर 15 मुर्तिया स्थापित है | साथ ही साथ मंदिर के अन्दर भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा है | इस मंदिर को “धरती का वैकुण्ठ” भी कहा जाता है | बद्रीनाथ मंदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है |
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लोककथा के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना :-

पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान भगवान शिव भूमि( केदार भूमि ) के रूप में व्यवस्थित था | भगवान विष्णु अपने ध्यानयोग के लिए एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के पास शिवभूमि का स्थान बहुत भा गया | उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के पास) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के पास बालक रूप धारण किया और रोने लगे |

उनके रोने की आवाज़ सुनकर माता पार्वती और शिवजी उस बालक के पास आये |और उस बालक से पूछा कि तुम्हे क्या चाहिए | तो बालक ने ध्यानयोग करने के लिए शिवभूमि (केदार भूमि) का स्थान मांग लिया | इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव पार्वती से शिवभूमि (केदार भूमि) को अपने ध्यानयोग करने हेतु प्राप्त कर लिया |यही पवित्र स्थान आज बद्रीविशाल के नाम से भी जाना जाता है | ( बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! )
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बद्रीनाथ के अन्य धार्मिक स्थल (Religious Place of Badrinath Temple)


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1. अलकनंदा के तट पर स्थित अद्भुत गर्म झरना जिसे ‘तप्त कुंड’ कहा जाता है।

2. एक समतल चबूतरा जिसे ‘ब्रह्म कपाल’ कहा जाता है।

3. पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक ‘सांप’ शिला है |

4. शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड ‘शेषनेत्र’ है।

5. भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं- ‘चरणपादुका’ |

6. बद्रीनाथ से नजर आने वाला बर्फ़ से ढका ऊंचा शिखर नीलकंठ, जो ‘गढ़वाल क्वीन’ के नाम से जाना जाता है |
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( बद्रीनाथ मंदिर का नाम बद्रीनाथ कैसे पडा )

इसके पीछे एक रोचक कथा है , यह कहते है कि एक बार देवी लक्ष्मी , भगवान विष्णु से रूठकर मायके चले गयी | तब भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए तपस्या करने लगे | जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई | तो देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को ढूंढते हुए उस जगह पहुँच गई , जहाँ भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे | उस समय उस स्थान पर बदरी (बेड) का वन था | बेड के पेड़ में बैठकर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी  इसलिए लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को “बद्रीनाथ” नाम दिया |
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बद्रीनाथ मंदिर की मान्यताये (Beliefs of Badrinath Temple)

1. बद्रीनाथ मंदिर की पौराणिक मान्यताओ  के अनुसार , जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हो रही थी , तो गंगा नदी 12 धाराओ में बट गयी |

इस लिए इस जगह पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से प्रसिद्ध हुई |

और इस जगह को भगवान विष्णु ने अपना निवास स्थान बनाया और यह स्थान बाद में “बद्रीनाथ” कहलाया |

2. बद्रीनाथ मंदिर की मान्यता यह भी है कि प्राचीन काल मे यह स्थान बेरो के पेड़ो से भरा हुआ करता था | इसलिए इस जगह का नाम बद्री वन पड़ गया |

और यह भी कहा जाता है की इसी गुफा में ” वेदव्यास “ ने महाभारत लिखी थी और पांडवो के स्वर्ग जाने से पहले यह जगह उनका अंतिम पड़ाव था | जहाँ वे रुके थे |

3. बद्रीनाथ मंदिर के बारे में एक मुख्य कहावत है | ( बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! )

” जो जाऐ बद्री , वो ना आये ओदरी “

अर्थात जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है |

उसे माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता है | मतलब दर्शन करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है |

बद्रीनाथ मंदिर की मान्यता  यह है कि भगवान बद्रीनाथ के दर पर सभी श्रद्धालु की मनचाही इच्छा पूरी होती है |

4. बद्रीनाथ धाम की मान्यता यह है कि बद्रीनाथ में भगवान शिव जी को ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली थी |
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इस घटना की याद “ब्रह्मकपाल” नाम  से जाना जाता है | ब्रह्मकपाल एक ऊँची शिला है | जहाँ पितरो का तर्पण,श्राद्ध किया जाता है | माना जाता है कि यहाँ श्राद्ध करने से पितरो को मुक्ति मिल जाती है |

5. इस जगह के बारे में यह भी कहते है कि इस जगह पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी | नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण के रूप में जन्मे थे |

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चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये , अल्मोड़ा (History and Beliefs of Chitai Golu Devta Temple , Almora)

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिर “चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताओ” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताओ के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक जरुर पढ़े !!

अल्मोड़ा में स्थित प्रसिद्ध मंदिरों की जानकारी के लिए निचे दिए गए लिंक में क्लिक करे !

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[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’कसार देवी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यताये ! (History and Beliefs of Kasar Devi Temple , Almora)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-and-beliefs-of-kasaar-devi-temple-almora/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#519ae8′ custom_content=” color=” custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]

[av_icon_box position=’left’ icon_style=” boxed=” icon=’ue81f’ font=’entypo-fontello’ title=’दूनागिरी मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! (History and beliefs of Doonagiri temple ,Almora)’ link=’manually,http://www.uttarakhanddarshan.in/history-and-beliefs-of-doonagiri-temple-almora/’ linktarget=’_blank’ linkelement=’both’ font_color=’custom’ custom_title=’#519ae8′ custom_content=” color=” custom_bg=” custom_font=” custom_border=” admin_preview_bg=”][/av_icon_box]
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चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये ,अल्मोड़ा  (History and Beliefs of Chitai Golu Devta Temple , Almora)

उत्तराखंड को देव भूमि के नाम से भी जाना जाता है , क्योकिं उत्तराखंड में कई देवी देवता वास करते है | (चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये ,अल्मोड़ा )

जो कि हमारे ईष्ट देवता भी कहलाते है जिसमे से एक है , गोलू देवता |

जिला मुख्यालय अल्मोड़ा से आठ किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ हाईवे पर न्याय के देवता कहे जाने वाले गोलू देवता का मंदिर स्थित है, इसे चितई ग्वेल भी कहा जाता है | सड़क से चंद कदमों की दूरी पर ही एक ऊंचे तप्पड़ में गोलू देवता का भव्य मंदिर बना हुआ है। मंदिर के अन्दर घोड़े में सवार और धनुष बाण लिए गोलू देवता की प्रतिमा है।

उत्तराखंड के देव-दरबार महज देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना, वरदान के लिए ही नहीं अपितु न्याय के लिए भी जाने जाते हैं | यह मंदिर कुमाऊं क्षेत्र के पौराणिक भगवान और शिव के अवतार गोलू देवता को समिर्पत है । ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण चंद वंश के एक सेनापति ने 12वीं शताब्दी में करवाया था।

एक अन्य कहानी के मुताबिक गोलू देवता चंद राजा, बाज बहादुर ( 1638-1678 ) की सेना के एक जनरल थे और किसी युद्ध में वीरता प्रदर्शित करते हुए उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके सम्मान में ही अल्मोड़ा में चितई मंदिर की स्‍थापना की गई।पहाड़ी पर बसा यह मंदिर चीड़ और मिमोसा के घने जंगलों से घिरा हुआ है। हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं।
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कुमाउं के प्रसिद्ध निम्न चार स्थानो में स्थित गोलू देवता का मंदिर :-


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1. गोलू देव मंदिर , चितई , अल्मोड़ा

2. चम्पावत गोलू मंदिर , चम्पावत

3. घोराखाल गोलू मंदिर , घोडाखाल

4. तारीखेत गोलू मंदिर , ताडीखेत

लोगों को मंदिरों में जाकर अपनी मुरादें मांगते देखा होगा | लेकिन उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित गोलू देवता के मंदिर में केवल चिट्ठी भेजने से ही मुराद पूरी हो जाती है। मूल मंदिर के निर्माण के संबंध में हालांकि कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं | परन्तु पुजारियों के अनुसार 19वीं सदी के पहले दशक में इसका निर्माण हुआ था।

इतना ही नहीं गोलू देवता लोगों को तुरंत न्याय दिलाने के लिए भी प्रसिद्ध हैं। इस‌ कारण गोलू देवता को “न्याय का देवता” भी कहा जाता है।
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चितई गोलू देवता मंदिर की मान्यताये

इस मंदिर की मान्यता ना सिर्फ देश बल्कि विदेशो तक में है | इसलिए इस जगह में दूर दूर से पर्यटक और श्रदालु आते है | इस मंदिर में प्रवेश करते ही यहाँ अनगिनत घंटिया नज़र आने लगती है |

कई टनों में मंदिर के हर कोने कोने में देखने वाले इन घंटे घंटियों की संख्या कितनी है , ये आज तक मंदिर के लोग भी नहीं जान पाए | आम लोग के द्वारा इसे घंटियों वाला मंदिर भी पुकारा जाता है | जहा कदम रखते ही घंटियों की पंक्तियाँ शुरू हो जाती है |

चितई मंदिर में मनोकामना पूर्ण होने के लिए भक्तो के द्वारा अनेक अर्ज़िया लगायी जाती है | क्योंकि माना जाता है कि जिन्हें कही से न्याय नहीं मिलता है वो गोलू देवता की शरण में पहुचते है | और लोगो का मानना यह भी है कि ” गोलू देवता न्याय करते ही है ” | क्युकी गोलू देवता को “ न्याय का देवता ” माना जाता है |
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और यदि आप गोलू देवता की कहानी को जानना चाहते है तो इस लिंक में क्लिक करे :- घोडाखाल गोलू देवता की कहानी 

चितई मंदिर में लोग स्टाम्प पेपर पर लिखकर मन्नते मांगते है और मन्नते पूर्ण होने पर घंटिया चढाते है | और गोलू देवता के प्रति आस्था आप खुद मंदिर में लगी घंटियों को देखकर समझ सकते है |

चितई गोलू देवता मंदिर की यह मान्यता भी है कि यदि कोई नव विवाहित जोड़ा इस मंदिर में दर्शन के लिए आते है | तो उनका रिश्ता सात जन्मो तक बना रहता है |

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उम्मीद करते है कि आपको “चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये” के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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Sattal Lake – A tourist place in Nainital

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में स्थित प्रसिद्ध ताल “सातताल-एक पर्यटन स्थल !! Sattal Lake – A tourist place in Nainital” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप सातताल के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

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Sattal Lake – A tourist place in Nainital

कुमाऊँ’ के सभी तालों में ‘सातताल’ का जो अनोखा और खूबसूरत सौन्दर्य है, वह किसी दूसरे ताल का नहीं है | Sattal Lake – A tourist place in Nainital

सातताल झील नैनीताल से 23 km की दुरी पर स्थित एक खूबसूरत झील है | यह झील उत्तराखंड में स्थित है |
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इस झील तक पहुचने का मुख्य रास्ता भीमताल से है |भीमताल से सातताल की दुरी केवल 4 km है |आजकल सातताल के लिए एक नया रास्ता माहरागांव से बनाया गया है | माहरागांव से सातताल केवल 7 km दूर है | इस ताल में नौका विहार करने वालो को विशेष सुविधाए प्रदान की गयी है | उत्तराखंड में बहुत सारे पर्यटन स्थल है और सभी पर्यटन स्थल के पीछे कोई ना कोई पौराणिक या एतिहासिक कथा जुडी हुयी है |

भीमताल से आगे सातताल देखने के बाद नौकुचियाताल भी जरुर घूमना चाहिए | क्युकी नौकुचियाताल का इतिहास और वहा की रोमांचित भरी गतिविधिया और नौकुचियाताल का ताल , उस स्थान के वातावरण में आने को उत्साहित कर देता है |
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Story of Sattal (इतिहास सातताल का)

पौराणिक कथा सातताल की

इसी प्रकार सातताल के साथ एक कथा जुडी हुई है | कहा जाता है कि पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में एक प्रसिद्ध राजा थे जिनका नाम था “नल” और उनकी पत्नी का नाम “दमयन्ती” था | किसी कारण से अपने भाई “पुष्कर” के द्वारा चौदह वर्ष के लिए राज्य निष्कासन की सजा सुनाये जाने के कारण “नल और दमयन्ती” गरीब और दयनीय हालत में दर-दर भटकते रहे । भटकते हुए “नल और दमयन्ती” ने सातताल क्षेत्र के शांत वातावरण में शरण ली और अपने वनवास के दिन व्यतीत करे | उन्ही के नाम पर इस क्षेत्र में एक ताल भी है | जिसका नाम “नल-दमयन्ती ताल” हैं |

सातताल को पर्यटन विभाग की ओर से प्रमुख सैलानी क्षेत्र घोषित किया गया है।और सातताल के आसपास नाना प्रकार के फूल , लाताये लगायी जाती है | बैठने के अलावा इस जगह पर सीढियों और सुंदर सुंदर पुलों का निर्माण कर “सातताल” को स्वर्ग जैसा ताल बनाया गया है | सातताल में “नौकुचिया देवी” का मंदिर भी स्थित है |
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सातताल में उपस्थित सात ताल के नाम :-

1. नल-दमयंती ताल

2. गरुड़ ताल

3. राम ताल

4. लक्ष्मण ताल

5. सीता ताल

6. पूर्ण ताल

7. सुखा ताल
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नल दमयंती ताल इतिहास :-

इस ताल का नाम राजा “नल ” और रानी “दमयंती” के नाम पर पडा था | और इसी ताल में उनकी समाधी बना दी गयी थी | इस ताल का आकर “पंचकोणी” है | उस समय इस ताल से पुरे गाँव में सिचाई की जाती थी | इसमें कभी-कभी कटी हुई मछलियों के अंग दिखाई देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अपने जीवन के कठोर दिनों में नल दमयन्ती इस ताल के समीप निवास करते थे। जिन मछलियों को उन्होंने काटकर कढ़ाई में डाला था, वे भी उड़ गयी थीं। कहते हैं, उस ताल में वही कटी हुई मछलियाँ दिखाई देती हैं।

उसी समय एक महात्मा के द्वारा इस झील में मछलियाँ पाली गई थी और ऐसी मान्यता रही कि इस झील में कभी भी मछलियाँ नहीं मारी जा सकती हैं। यह मान्यता आज भी बनी हुई है। जिस की वजह से इस झील में आज भी काफ़ी बड़ी और प्रमुख मछलियों का अस्तित्व बचा हुआ है। इन मछलियों में प्रमुख हैं सिल्वर कार्प, गोल्डन कार्प और महासीर आदि मछलिया है | Sattal Lake – A tourist place in Nainital
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 गरुड़ ताल


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नल दमयंती ताल के बाद गरुड़ ताल आता है | यह एक छोटा सा ताल है इसका पानी बहुत भी साफ़ है | स्थानीय लोगो के अनुसार झील के पास पांडवो के वनवास के दौरान रानी द्रोपदी ने अपनी रसोई बनाई थी | रानी द्रोपदी द्वारा इस्तेमाल किये गए सिलबट्टे आज भी इस जगह में मौजूद है |

राम , लक्ष्मण , सीता ताल

इसी ताल से कुछ आगे राम, लक्ष्मण, सीता ताल है। यह ताल सबसे बड़ी ताल है जिसमें तीनों ताल एक साथ जुड़ी हुई है। कहा जाता है की यहाँ पर राम, लक्ष्मण, सीता रहा करते थे। यहाँ पांडव लोग भी रहे थे और यहीं भीम ने हिडिंबा राक्षसी का अंत किया था।

सुखा ताल और पूर्ण ताल

इस ताल का अस्तित्व लापारवाही के चलते अब समाप्त हो गया है | इस जगह के बारे में एक चर्चा है जो अपने शिल्प के लिए काफी मशहूर है | इस जगह पर विभिन्न प्रजाति की चिड़िया देखने को मिल जाती है |
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Activities to do in Sattal :-

Boating

इस जगह आप Boating का भी लुफ्त उठा सकते है | Boating खुद भी करी जाती है मगर उसके लिए आपको paddling वाली बोट का इस्तेमाल करना होता है | Boating के द्वारा आप सातताल झील का पूरा आनंद उठा सकते है | सातताल में सरकार के द्वारा Paddling Boating के लिए आप 220 rs देने होते है | जिसमे कि आप एक घंटा Boating कर सकते है | और यदि आप रोइंग Boating करना चाहते है | उसके लिए आपको आधे घंटे के 220 rs देने होते है | जो की ज्यादा महेंगी रकम नहीं है |

Paragliding

सातताल में आप पैराग्लाइडिंग का भी आनंद ले सकते है |

Trekking

इस जगह में trekking जैसे adventure का आनंद भी ले सकते है |यह जगह फोटोग्राफर के लिए एक स्वर्ग जैसी जगह है | झीलों से घिरे रसीला हरी घाटी आपको खुश करने के लिए क्लिक करने के लिए पर्याप्त अवसर देती है | Sattal Lake – A tourist place in Nainital

Subhash Dhara

सुभाष धारा एक ताजा पानी प्राकृतिक वसंत है |जो ओक के घने जंगल में स्थित है। यह स्थान पिकनिक मनाने के लिए एक रोमांचक जगह है |
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यह अपने आगंतुकों (Visitor) को बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करने के अपने प्राचीन साफ पानी से देखने के लिए एक दृष्टि प्रदान करता है |

Sattal Mission Estate and Methodist Ashram

सातताल ईसाई आश्रम, सत्तल झीलों के किनारे स्थित, एक पूर्व चाय सम्पत्ति पर। सेंट जॉन चर्च इस आश्रम का हिस्सा है और एक मिश्रित औपनिवेशिक वास्तुकला का प्रदर्शन करता है। यह 1 9 30 में उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ईसाई धर्म परिचय कराने के लिए स्थापित किया गया था। Sattal Lake – A tourist place in Nainital

 Butterfly Museum:-

जोन्स एस्टेट में फ्रेडरिक स्मेटैक्स द्वारा निर्मित एक अमीर तितली संग्रहालय है |

जिसमें 2,500 से अधिक तितली और पतंग नमूनों और इस क्षेत्र में पाए जाने वाले कीड़ों की 1,100 प्रजातियां हैं। बटरफ्फ़्लू संग्रहालय, सातताल यात्रा उत्तराखंड का एक खूबसूरत दृश्य हैं | सातताल में आप सातताल के पार्क में भी घूम सकते है | और इस जगह आपको जरुर घूमना चाहिए क्युकी उस जगह का वातावरण मन को अधिक को अधिक भाता है |

साथ ही साथ  सातताल में  Bull Ride , Jumping Trampoline , Rope-way आदि दिलचस्प गतिविधि कर सकते है |

सातताल में बच्चो के लिए अनेक प्रकार के खेल है | जो की आप हमारे द्वारा दिए गई Images को देख कर समझ सकते है |

जिससे की आपको अत्यंत मज़ा आएगा | और आपका समय आनंदमय व्यतित होगा |
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Best Time to visit Sattal

सातताल साल के किसी भी समय देखा जा सकता है। गर्मियों के दौरान मौसम अतिसुंदर,सुखद और लुभ्वाना होता है | सातताल में मानसून के महीनों के दौरान क्षेत्र हरा भरा दिखाई देता हैं। सातताल मानसून के महीनों के दौरान सबसे अच्छा चित्रकले पर है। सर्दी के दौरान सातताल की यात्रा की योजना बनाने में आपके मन ठंडा पढ़ सकता है क्योंकि तापमान में फ्रिज़िंग बिंदु के रूप में गिरावाट देखने को मिलती है |Sattal Lake – A tourist place in Nainital

यदि आप नैनीताल आते है तो साथ ही साथ सातताल भी जरुर घूमे |

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View Sattal Images in 360 degree :-

Sita and Ram Taal Images gallery in 360 degree:-

View Garud Taal in 360 degree:-

View Ram Sita and Garur From the top

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Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) in Bhimtal

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध ताल “नौकुचियाताल  (नौ कोने वाली झील ) !! Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) in Bhimtal” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप नौकुचियाताल  के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

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 Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) in Bhimtal

उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र में पर्यटन के लिए दर्शन स्थल में से एक स्थल है “नौकुचियाताल” | नौकुचियाताल एक ऐसी बड़ी झील है जिसकी सुन्दरता देखते ही बनती है | Naukuchiatal (Lake with Nine Corners)

नौकुचियाताल भीमताल से 4 किलोमीटर की दुरी पर दक्षिण पूर्व दिशा की ओर स्थित है |
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समुंदतल से नौकुचियाताल की ऊँचाई 1290 मीटर हैं , जो कि भीमताल के मुकाबले कुछ कम है । इस झील की लम्बाई एक किलोमीटर के आसपास , चौड़ाई करीब आधा किलोमीटर से ज्यादा और गहराई 40 मीटर से भी अधिक है । किंवदंती के अनुसार, जमीन पर खड़े होकर अगर कोई झील के सभी नौ कोने एक साथ देख लेता है, तो उसे मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है. हालांकि, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है |

इस ताल की एक और विशेषता यह है कि इसमें विदेशों से आये हुए नाना प्रकार के पक्षी रहते हैं। ताल में कमल के फूल खिले रहते हैं। इस ताल में मछलियों का शिकार बड़े अच्छे ढ़ंग से होता है। २०-२५ पौण्ड तक की मछलियाँ इस ताल में आसानी से मिल जाती है। मछली के शिकार करने वाले और नौका विहार शौकीनों की यहाँ भीड़ लगी रहती है। पानी के अन्दर एक झरना है जिससे झील में पूरे साल पानी का स्तर बना रहता है | इसके नौ कोने होने की वजह से इस ताल का नाम “नौकुचियाताल” पडा |
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Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) Best Way to Reach

नौकुचियाताल नैनीताल से करीब 26 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है | नैनीताल से नौकुचियाताल आने के लिए आपको दिन भर नैनीताल से दो तीन बार सरकारी बस की सुविधा उपलब्ध होती है | नैनीताल से भवाली , भवाली से भीमताल , फिर भीमताल से आप नौकुचियाताल से taxi भी कर सकते है | सरकारी बसों से भवाली से नौकुचियाताल तक के सफ़र में आपको स्थानीय लोगो से मिलने , उनसे बात करने , उनका जीवन और संस्कृति जाने का मौका भी मिल जाता है | इस तरह आप भीमताल से सिर्फ 5 किलोमीटर का सफ़र तय करके नौकुचियाताल पहुच सकते है | नौकुचियाताल जाते समय हनुमान जी की बहुत बड़ी मूर्ति भी स्थित है | जिसे देखकर मन में शान्ति उत्पन्न होती है |

यदि आप भीमताल क्षेत्र के “नौकुचियाताल” आते है तो साथ ही साथ “सातताल” भी जरुर घूमे | क्युकी सातताल भी एक आकर्षक पर्यटन केंद्र है |
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Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) Information 

नौकुचियाताल आने वाले पर्यटको (लोगो) के लिए सबसे आकर्षण “नौकुचियाताल की झील” ही है | इस झील की किनारों पर पानी के बीच झूलती पेड़ो की डालिया , डालियों पर बंदरो की हरकते देखकर तथा पक्षियों की मधुर आवाज़ सुनते हुए आपके मन को शांति और जन्नत का एहसास होगा | इस जगह के बारे में यह भी कहा जाता है कि इस झील का निर्माण परमपिता ब्रह्मा की कठोर तपस्या के कारण हुआ था | नौकुचियाताल झील के कुमाऊँ मंडल विकास निगम गेस्ट हाउस के पास में ही एक छोटा सा ब्रह्मा जी का मंदिर भी है | ( Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) in Bhimtal )

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स्थानीय लोगों के अनुसार झील के परिक्रमा करने वाले किसी भी व्यक्ति को ब्रह्माजी का आशीर्वाद मिलता है | कुमाऊँ की सर्वाधिक गहरी झील होने का कारण झील के पानी का रंग नीला नजर आता है | नौकुचियाताल में प्रवेश करने से कुछ ही पहले हनुमान मंदिर भक्तों के लिए एक आकर्षक स्थान है | बजरंग बली की 52 फीट ऊंची मूर्ति दूर से ही ध्यान खींच लेती है | मंदिर परिसर से पहाड़ों और घाटियों पर सीढ़ीदार खेतों का शानदार नजारा दिखाई देता है | नौकुचियाताल में माता वैष्णो देवी की कृत्रिम गुफाएं भी बनी हुई हैं |
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Naukuchiatal (Lake with Nine Corners) Activities :-

यदि आप नौकुचियाताल जगह की सुन्दरता का आनंद लेना चाहते है | तो नौकुचियाताल में आप विभिन्न प्रकार की गतिविधिया कर सकते है |

Boating 

राजसी नौ कोने वाली झील नौकुचियाताल का प्रमुख आकर्षण है और नौकायन (Boating) पर्यटन और हनीमून जोड़े के बीच सबसे लोकप्रिय गतिविधि में से एक है।

नौकायन (Boating) और पैडलिंग(Paddling) नौकायन के अन्य रूप हैं |

जो नौकुचियाताल में लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है |

Kayaking

Kayaking करना भी पर्यटक खासकर युवाओं का पसंदीदा adventure बन गया है |

कयाकिंग में डोंगी-नुमा बोट को दो ब्लेड वाले चप्पू के सहारे चलाया जाता है |

यहां बच्चे और बड़े जॉर्बिंग water zorbing का भी खूब लुत्फ उठाते हैं |

Water zorbing में पारदर्शी रंग की बड़ी सी गेंद में बैठकर पानी की सतह पर इसे लुढ़काया जाता है |
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Paragliding

साहसिक प्रेमी (Adventure Lover) विभिन्न प्रकार के साहसिक गतिविधियों (Adventure activity) में हिस्सा ले सकते हैं|

जिसमें पैराग्लाइडिंग भी शामिल है, जो आपको पक्षी की तरह आकाश में ऊंची उड़ान भरता है।

यह उत्तराखंड में सबसे लोकप्रिय साहसिक गतिविधियों में से एक है |

Fishing

जुंगलीगांव मछली पकड़ने के लिए जाना जाता है एक नौका जगह है।

इसके अलावा आप नौकुचियाताल में वनजीवन फोटोग्राफी और पक्षी देख सकते है | नौकुचियाताल शांत और सुरम्य स्थान है |फिर भी यहां ठहरने के लिए कुछ अच्छे Resort, Hotels और Home-stay आपको मिल जाएंगे | इसके अलावा 5 किमी दूर भीमताल Bhimtal में ठहरने के लिए बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं | इस तरह आप नौकुचियाताल के मजे उठा सकते है |

उम्मीद करते है Naukuchiatal (A Lake with Nine Corners ) in Bhimtal के बारे में जानकारी जान कर आपको मज़ा आया होगा |


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पाताल भुवनेश्वर का इतिहास और मान्यताये ! History and Beliefs of Pataal Bhuvaneshwar Temple

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नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में स्थित प्रसिद्ध मंदिर “पाताल भुवनेश्वर का इतिहास और मान्यताये ! History and Beliefs of Pataal Bhuvaneshwer Temple” के बारे में जानकारी देने वाले है , यदि आप पिथौरागढ़ जिले में स्थित “पाताल भुवनेश्वर का इतिहास एवम मान्यताओ” के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

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पाताल भुवनेश्वर का इतिहास और मान्यताये(History of Patal Bhuvaneshwer)

पाताल भुवनेश्वर मंदिर पिथौरागढ़ जनपद उत्तराखंड राज्य का प्रमुख पर्यटक केन्द्र है। ( पाताल भुवनेश्वर का इतिहास और मान्यताये )

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है |पाताल भुवनेश्वर देवदार के घने जंगलों के बीच अनेक भूमिगत गुफ़ाओं का संग्रह है | जिसमें से एक बड़ी गुफ़ा के अंदर शंकर जी का मंदिर स्थापित है । यह संपूर्ण परिसर 2007 से भारतीय पुरातत्व विभागद्वारा अपने कब्जे में लिया गया है |
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पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा किसी आश्चर्य से कम नहीं है।यह गुफा प्रवेश द्वार से 160 मीटर लंबी और 90 फीट गहरी है । पाताल भुवनेश्वर की मान्यताओं के मुताबिक, इसकी खोज आदि जगत गुरु शंकराचार्य ने की थी । पाताल भुवनेश्वर गुफा में केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के दर्शन भी होते हैं।
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पौराणिक इतिहास पाताल भुवनेश्वर का :-

पुराणों के मुताबिक पाताल भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन होते हों। यह पवित्र व रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। मान्यता है कि इस गुफा में 33 करोड़ देवी-देवताओं ने अपना निवास स्थान बना रखा है।

पुराणों मे लिखा है कि त्रेता युग में सबसे पहले इस गुफा को राजा ऋतूपूर्ण ने देखा था , द्वारपार युग में पांडवो ने यहः शिवजी भगवान् के साथ चौपाड़ खेला था और कलयुग में जगत गुरु शंकराचार्य का 722 ई के आसपास इस गुफा से साक्षत्कार हुआ तो उन्होंने यहः ताम्बे का एक शिवलिंग स्थापित किया | इसके बाद जाकर कही चंद राजाओ ने इस गुफा को खोजा | आज के समय में पाताल भुवानेश्वर गुफा सलानियो के लिए आकर्षण का केंद्र है | देश विदेश से कई सैलानी यह गुफा के दर्शन करने के लिए आते रहते है |
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पाताल भुवनेश्वर की मान्यताये एवम विशेषताए (Values and Features of Patal Bhuvaneshwer)

पाताल भुवनेश्वर गुफा के अन्दर भगवान गणेश जी का मस्तक है :-

हिंदू धर्म में भगवान गणेशजी को प्रथम पूज्य माना गया है। गणेशजी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोध में  गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान गणेश को हाथी का मस्तक लगाया गया था, लेकिन जो मस्तक शरीर से अलग किया गया, माना जाता है कि वह मस्तक भगवान शिवजी ने पाताल भुवानेश्वर गुफा में रखा है |

पाताल भुवनेश्वर की गुफा में भगवान गणेश कटे ‍‍शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल के रूप की एक चट्टान है।
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इससे ब्रह्मकमल से पानी भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है। मुख्य बूंद आदिगणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है। मान्यता है कि यह ब्रह्मकमल भगवान शिव ने ही यहां स्थापित किया था।

पाताल भुवनेश्वर गुफा के अन्दर रखी चीजों का रहस्य :-


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इस गुफाओं में चारों युगों के प्रतीक रूप में चार पत्थर स्थापित हैं।

इनमें से एक पत्थर जिसे कलियुग का प्रतीक माना जाता है, वह धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। यह माना जाता है कि जिस दिन यह कलियुग का प्रतीक पत्थर दीवार से टकरा जायेगा उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा।

( पाताल भुवनेश्वर का इतिहास और मान्यताये )
इस गुफा के अंदर केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के भी दर्शन होते हैं। बद्रीनाथ में बद्री पंचायत की शिलारूप मूर्तियां हैं | जिनमें यम-कुबेर, वरुण, लक्ष्मी, गणेश तथा गरूड़ शामिल हैं। तक्षक नाग की आकृति भी गुफा में बनी चट्टान में नजर आती है। इस पंचायत के ऊपर बाबा अमरनाथ की गुफा है तथा पत्थर की बड़ी-बड़ी जटाएं फैली हुई हैं। इसी गुफा में कालभैरव की जीभ के दर्शन होते हैं। इसके बारे में मान्यता है कि मनुष्य कालभैरव के मुंह से गर्भ में प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
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मान्यता पाताल भुवनेश्वर गुफा के अन्दर बनी आकृति की 

गुफ़ा में घुसते ही शुरुआत में (पाताल के प्रथम तल) नरसिम्हा भगवान  के दर्शन होते हैं।

कुछ नीचे जाते ही शेषनाग के फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नज़र आती है |मान्यता है कि धरती इसी पर टिकी है । गुफ़ाओं के अन्दर बढ़ते हुए गुफ़ा की छत से गाय की एक थन की आकृति नजर आती है । यह आकृति कामधेनु गाय का स्तन है कहा जाता था की देवताओं के समय मे इस स्तन में से दुग्ध धारा बहती है। कलियुग में अब दूध के बदले इससे पानी टपक रहा है।

इस गुफा के अन्दर आपको मुड़ी गर्दन वाला गौड़(हंस) एक कुण्ड के ऊपर बैठा दिखाई देता है |यह माना जाता है कि  शिवजी ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था। इसकी देखरेख गरुड़ के हाथ में थी। लेकिन जब गरुड़ ने ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो शिवजी ने गुस्से में उसकी गरदन मोड़ दी।

(हंस की टेड़ी गर्दन वाली मूर्ति । ब्रह्मा के इस हंस को शिव ने घायल कर दिया था क्योंकि उसने वहां रखा अमृत कुंड जुठा कर दिया था।)

यदि आप पिथोरागढ़ आये तो गंगोलीहाट में स्थित पाताल भुवनेश्वर मंदिर के दर्शन जरुर करे |
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उम्मीद करते है कि पाताल भुवनेश्वर का इतिहास और मान्यताये  के बारे में पढ़कर आनंद आया होगा |

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