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घोडाखाल मंदिर का इतिहास , मान्यताये एवम् विशेषताये ! (History , Features and Values of Ghorakhal Temple (Bhowaali) !

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घोडाखाल मंदिर का इतिहास (History of Ghorakhaal Temple)

घोड़ाखाल गोलू देवता मंदिर में वैसे तो वर्ष भर देश-विदेश से पूजा अर्चना करने श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है। मगर नवरात्रों में यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते है।

उत्तराखण्ड में न्यायी देवता के रूप मे पूजे जाते हैं ” गोलू देवता ” , ” गोलज्यू महाराज “ |

नैनीताल जिले के भवाली से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर बसा है रमणीक , शांत एंव धार्मिक स्थल “घोड़ाखाल” | घोड़ाखाल न्यायी गोलू देवता के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है | (घोडाखाल मंदिर का इतिहास , मान्यताये एवम् विशेषताये ! )
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“घोड़ाखाल” का शाब्दिक अर्थ है ” घोड़ों के लिए पानी का एक तालाब “ |

घोड़ाखाल एक छोटा सा गांव सुन्दर पहाड़ी क्षेत्र है , जो कि मुख्य रूप से पहाड़ी लोगों द्वारा पूजा की गई भगवान गोलू के मंदिर के लिए जाना जाता है |

जो समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित आकर्षक क्षेत्र है |

इसे ” घंटियों के मंदिर ” के नाम से भी जाना जाता है |

गोलू देवता का मंदिर भव्य व आकर्षक है |

चारों ओर टंगी घंटियां व भक्तों के कागजों पर लिखे मन्नतों स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है कि देवभूमि में गोलू देवता न्यायी देवता के रूप में पूजे जाते हैं |

मंदिर में हर तरफ बंधी हजारों घंटियां लोगों में गोलू देवता की आस्‍था का प्रतीक है।

घोड़ाखाल जहां अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात हैं वहीं यह आध्यात्म व प्रमुख धार्मिक स्थल है |

यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है |

नवरात्रों व श्रावण मास में मंदिर में अत्यधिक चहल पहल बढ़ी रहती है |
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घोडाखाल मंदिर के गोल्जू देवता की कहानी (Story of Golju Devta of Ghorakhal Temple)

किंवदन्तियों के अनुसार “गोलू देवता” की उत्पत्ति कत्यूर वंश के “राजा झालराई” से मानी जाती है।जिनकी तत्कालीन राज्य की राजधानी धूमाकोट चम्पावत थी |

राजा झालराई की सात रानियां होने पर भी वह नि:संतान थे। संतान प्राप्ति की आस में राजा द्वारा काशी के सिद्ध बाबा से भैरव यज्ञ करवाया और सपने में उन्हें “गौर भैरव” ने दर्शन दिए और कहा राजन अब आप आठवां विवाह करो ” मै उसी रानी के गर्भ से आपके पुत्र रूप में जन्म लूंगा |

राजा ने आठवां विवाह “कालिंका” से रचाया । और जल्द ही रानी गर्भवती हो गई | गर्भवती होने के कारण सातो रानियों में ईष्या उत्पन्न हो गई | रानियों ने षड्यंत्र रचकर कालिंका को यह बात बताई कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए माता से पैदा होने वाले शिशु की सूरत सात दिनों तक नहीं देखनी पड़ेगी  | और प्रसव के दिन सातो रानियों ने नवजात शिशु की जगह सिलबट्टा रख देती है | सातो रानियों ने कालिंका रानी को बताया कि उसने सिलबट्टे को जन्म दिया है | उसके बाद सातो रानी मिल कर कालिका के पुत्र को मारने की साजिश रचने लगी | सर्वप्रथम सातो रानियों ने मिलकर रानी कालिंका के पुत्र के लिए यह योजना बनायीं | वो बालक को गौसाला में फैक देंगे | और वो बालक जानवरों के पैर तले कुचलकर मर जाएगा |

सातो रानियाँ उस बालक को गौसाला में फेक कर चले जाती है| थोड़े समय बाद जब रानियाँ बालक को गौसाला में देखें आती है | तो वो देखती है कि गाय घुटने टेक कर शिशु के मुंह में अपना थन डाले हुए दूध पिला रही है | बहुत कोशिश करने के बाद भी बालक नहीं मरता है | बाद में रानियाँ उस बालक को संदूक में डालकर काली नदी में फेक देती है | मगर ईश्वर के चमत्कार से संदूक तैरता हुआ गौरी घाट तक पहुंच जाता है ।
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मछवारे को बालक के दर्शन :- 

गौरी घात में वो संदूक “भाना” नामक मछुवारे के जाल में फंस जाता है ।

मछुवारे की संतान ना होने के कारण मछुवारा उस बालक को देख कर प्रसन्न होकर उसे घर ले जाता है |

गौरी घाट में मिलने के कारण मछुवारा उस बालक का नाम “गोरिया” रख देता है |

बालक जब बड़ा होने लगा तो वो उस मछवारे से घोड़े की जिद्द करने लगाता है |

लेकिन मछुवारे के पास घोडा खरीदने के लिए पैसे  होने के कारण वो बडिय एक लड़की का घोडा बना लाता है |

बालक उस काठ के घोड़े से अंत्यंत खुश हो जाता है |

एक दिन जब बालक उस घोड़े पर बैठता  है तो वह घोड़ा सरपट दौड़ने लगाता है ।

यह नजारा देख गांव वाले चकित रह गए ।
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बालक की सातो रानियों से मुलाक़ात :-

एक दिन बालक उसी काठ के घोड़े में बैठकर धुमाकोट नामक स्थान पर पहुच जाता है |
जहां सातों रानियां राजघाट से पानी भर रही थीं।

और बालक अपनी माता  “कालिंका” के प्रति रचे षड्यंत्र की बात रानियों के मुख से सुन लेता है |

ये बात बालक जान कर भी उस समय शांत रहता है |

वह रानियों के पास जाकर कहता है कि पहले उनका घोडा पानी पिएगा | उसके बाद आप पानी भरेंगे |

यह सुनकर रानिया हसने लगती है और कहती है “मुर्ख काठ का घोडा भी कही पानी पी सकता है”।

उसके बाद बालक बोलता है “जब स्त्री के गर्भ से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो कांठ का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता”।

यह सुनकर सातों रानियां घबरा जाती है ।

राजा से उस बालक के बारे में शिकायत कर देती है |

उसके बाद राजा उस बालक को बुलाकर सच्चाई जानना चाहता था |

तो बालक ने सातों रानियों द्वारा उनकी माता कालिंका के साथ रचे गये षडयंत्र की कहानी सुनाता है ।

कहानी सुनने के बाद राजा उस बालक से अपने पुत्र होने का प्रमाण मांगता है |

इस पर बालक गोरिया ने कहा कि ” यदि मैं माता कालिंका का पुत्र हूं तो इसी पल मेरे माता के वक्ष से दूध की धारा निकलकर मेरे मुंह में चली जाएगी और ऐसा ही हुआ “। राजा ने बालक को गले लगा लिया और राजपाट सौंप दिया।

इसके बाद वह राजा बनकर जगह-जगह न्याय सभाएं लगाकर प्रजा को न्याय दिलाते रहे।

न्याय देवता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद वह अलोप हो गए।
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गोल्ज्यू देवता के नाम :-

वही बालक बड़ा होकर ” ग्वेल” , “गोलू”, “बाला गोरिया” तथा ” गौर भैरव ” नाम से प्रसिद्ध हुआ। “ग्वेल” नाम इसलिये पड़ा कि इन्होंने अपने राज्य में जनता की एक रक्षक के रुप में रक्षा की और हर विपत्ति में ये जनता की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से रक्षा करते थे।

गौरीहाट में ये मछुवारे को संदूक में मिले थे, इसलिये “बाला गोरिया” कहलाये । भैरव रुप में इन्हें शक्तियां प्राप्त थीं और इनका रंग अत्यन्त सफेद होने के कारण इन्हें ” गौर भैरव ” भी कहा जाता है। ग्वेल जी को न्याय का देवता भी कहा जाता है।

उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में स्थित चितई गोलू देवता मंदिर का इतिहास और मान्यताये बिलकुल एक समान जैसी ही है |
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घोडाखाल मंदिर की विशेषताये और मान्यताये  Ghorakhal Temple Features and Values

स्थानीय लोगो के अनुसार “गोल्जू देवता को ” घोड़ाखाल मंदिर में स्थापित करने का श्रेय महरागांव की एक महिला को माना जाता है। यह महिला वर्षो पूर्व अपने परिजनों द्वारा सतायी जाती थी । उसने चम्पावत अपने मायके जाकर गोलज्यू देवता से न्याय हेतु साथ चलने की प्रार्थना की।

इसी कारण गोलज्यू देवता उस महिला के साथ घोडाखाल मंदिर में विराजे |

घोराखाल मंदिर की विशेषताए यह है कि श्रद्धालु यहां पर अपनी अपनी मन्नतें कागजों , पत्रों में लिखकर मंदिर में एक स्थान पर टांगते हैं |

और माना जाता है कि गोलू देवता उन मन्नतों पर अपना न्याय देकर भक्तों की पुकार सुनते हैं |

उनकी मन्नतो को पूरा करते है |
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और मन्नतें पूरी होने पर लोग न्यायी देवता के मंदिर में भेट स्वरुप “घंटीयां” चढ़ाते हैं |

यहाँ एक ऐसी मान्यता भी है | यदि कोई नव विवाहित जोड़ा इस मंदिर में दर्शन के लिए आते है | तो उनका रिश्ता सात जन्मो तक बना रहता है |

उत्तराखंड के अल्मोड़ा और नैनीताल जिले में घोड़ाखाल मंदिर स्थित गोलू देवता के मंदिर में केवल चिट्ठी भेजने से ही मुराद पूरी हो जाती है।

इतना ही नहीं गोलू देवता लोगों को तुरंत न्याय दिलाने के लिए भी प्रसिद्ध हैं |

उम्मीद करते है घोडाखाल मंदिर का इतिहास , मान्यताये एवम् विशेषताये ! पढ़कर आनंद आया होगा |

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उत्तराखंड में “घी त्यार” क्यों मनाया जाता है और इसका महत्व क्या है ?

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उत्तराखंड का पर्व “घी त्यार “

उत्तराखंड कृषि पर आधारित एक राज्य है |
पौराणिक समय से यहाँ की सभ्यता जल , जंगल और जमीन से मिलने वाले संसाधन पर निर्भय रही है |
प्रकर्ति और किसानो का उत्तराखंड के लोक जीवन में अत्यधिक महत्व रहा है |
सौर मासीय पंचांग के अनुसार सूर्य एक राशि में संचरण करते हुए जब दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं।
इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं .इस को भी शुभ दिन मानकर कई त्योहार मनाये जाते हैं ।
और इन्ही त्यौहार में से एक है “घी तयार” |
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उत्तराखंड में “घी त्यार”  क्यों मनाया जाता है ?

उत्तराखण्ड में हिन्दी मास (महीने) की प्रत्येक १ गते यानी संक्रान्ति को लोक पर्व के रुप में मनाने का प्रचलन रहा है।
उत्तराखंड में यूं तो प्रत्येक महीने की संक्रांति को कोई त्योहार मनाया जाता है।
भाद्रपद (भादो)महीने की संक्रांति जिसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं ।
इस दिन सूर्य “सिंह राशि” में प्रवेश करता है और इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं।
उत्तराखंड में भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।
यह त्यौहार भी हरेले की ही तरह ऋतु आधारित त्यौहार है,
हरेला जिस तरह बीज को बोने और वर्षा ऋतू के आने के प्रतीक का त्यौहार है |
वही “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालिया के लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है |

यह खेती बाड़ी और पशु के पालन से जुड़ा हुआ एक ऐसा लोक पर्व है |
जो की जब बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में बालियाँ आने लगती हैं ।
तो किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं।
फसलो में लगी बालियों को किसान अपने घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों और गोबर से चिपकाते है |
इस त्यौहार के समय पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलहाना शुरु कर देती हैं।
साथ ही स्थानीय फलों, यथा अखरोट आदि के फल भी तैयार होने शुरु हो जाते हैं।
पूर्वजो के अनुसार मान्यता है कि अखरोट का फल घी-त्यार के बाद ही खाया जाता है । इसी वजह से घी तयार मनाया जाता है |
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उत्तराखंड में “घी त्यार” का महत्व |

उत्तराखंड में घी त्यार किसानो के लिए अत्यंत महत्व रखता है |
और आज ही के दिन उत्तराखंड में गढ़वाली , कुमाउनी सभ्यता के लोग घी को खाना जरुरी मानते है |
क्युकी घी को जरुरी खाना इसलिए माना जाता है क्युकी इसके पीछे एक डर भी छिपा हुआ है |
वो डर है घनेल ( घोंगा ) (Snail) का |
पहाड़ों में यह बात मानी जाती है कि जो घी संक्रांति के दिन जो व्यक्ति घी का सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में घनेल (घोंघा) (Snail) बनता है ।
इसलिए इसी वजह से है कि नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है ।

यहां तक उसकी जीभ में थोड़ा सा घी रखा जाता है ।
इस दिन हर परिवार के सदस्य जरूर घी का सेवन करते है ।
जिसके घर में दुधारू पशु नहीं होते गांव वाले उनके यहां दूध और घी पहुंचाते हैं |
बरसात में मौसम में पशुओं को खूब हरी घास मिलती है ।
जिससे की दूध में बढ़ोतरी होने से दही -मक्खन -घी की भी प्रचुर मात्रा मिलती है |
इस दिन का मुख्य व्यंजन बेडू की रोटी है। (जो उरद की दाल भिगो कर, पीस कर बनाई गई पिट्ठी से भरवाँ रोटी बनती है ) और घी में डुबोकर खाई जाती है। अरबी के बिना खिले पत्ते जिन्हें गाबा कहते हैं, उसकी सब्जी बनती है |
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Top Beautiful Places to visit in Pangot (Nainital , Uttarakhand )!!

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Top Places to visit in Pangot Nainital , Uttarakhand

पंगोट, एक पर्यटन स्थल है , जो नैनीताल शहर से 15 किमी की दूरी पर स्थित है।( Places to visit in Pangot Nainital , Uttarakhand )

इस पर्यटन स्थल की ओर जाने वाली सड़क से गुज़रते हुए यात्री नैना पीक, स्नो-पीक और किलबरी का नज़ारा कर सकते हैं।

यह पक्षी प्रेमियों के स्वर्ग के रूप में प्रसिद्ध है क्योंकि लगभग 150 पक्षी प्रजातियाँ यहाँ वास करती हैं।

आमतौर पर यहाँ देखे जाने वाले पक्षियों में ग्रिफॉन, रयुफस बेली वुड-पैकर (कठफोड़वा), नीले पंख वाले मिनला, धब्बेदार और स्लेटी फोर्कटेल, लैमरगेयर्स, रयुफस बेली निलतावास और खलीज़ तीतर शामिल हैं। इस जगह का वातावरण अत्यधिक सुहाना है |

पंगोट में आप ट्रैकिंग , कैम्पिंग , पैराग्लाइडिंग आदि अन्य चीज़ कर सकते है |

पंगोट का मौसम ग्रीष्मकाल में (मार्च-जुलाई) तापमान 25 डिग्री सेल्सियस में सुबह / नॉन से रात 12 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है।

विंटर्स में (दिसंबर-जनवरी) तापमान 18 डिग्री सेल्सियस से सुबह / दोपहर से रात 8 डिग्री सेल्सियस तक होता है।

इस मौसम में आपको एक हलकी जैकेट और एक स्वेटर ले जाने की सिफारिश की जाती है ।

पंगोट में आप हमारे द्वारा निचे बताई जगह में घूम कर पंगोट की सौन्दर्यता और प्राकर्तिक मौसम का लुफ्त उठा सकते है  |
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Places to visit in Pangot ( Brahmasthali ) ( ब्रह्मस्थली )

यह जगह pangot से 8 km की दुरी पर स्थित है |

आप चाहे तो कार , बाइक से 6 km की दुरी तय कर सकते है |

उसके बाद आपको 2 km पैदल चलकर आप ब्रह्मस्थली पहुच सकते है |

इस जगह का वातावरण अत्यधिक मनमोहक होता है |

ब्रह्मस्थली जगह में पौराणिक कुटियाँ भी स्थित है जहाः आपको बाबा की कुटियाँ के दर्शन भी होंगे |

इस जगह में आपको एक बाबा मिलेंगे जो की बहुत समय से उस स्थान में रह रहे है | बाबा को इस स्थान में रहकर भी बाहरी दुनिया के बारे में भी जानकारी होती है | ब्रह्मस्थाली पंगोट में घूमने लायक बहुत ही बेहतरीन जगह है |
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Places to visit in Pangot ( Nainital ) ( नैनीताल )

सबसे लोकप्रिय और अतिसुंदर पहाड़ी स्टेशन “नैनीताल” उत्तराखंड राज्य में कुमाऊ क्षेत्र में स्थित है।

नैनीताल की खोज सन 1841 में एक अँगरेज़ चीनी व्यपारी ने की , बाद में अंग्रेजो ने इसे आरामगृह और स्वास्थ लाभ लेने की जगह के रूप में स्वीकार लिया | नैनीताल तीनो दिशायो से घने पेड़ो की छाया में ऊँचे ऊँचे पर्वत के बीच समुन्द्रतल से 1938 मीटर की ऊँचाई पर बसा है | नैनीताल के ताल की लम्बाई 1358 मीटर और चौडाई 458 मीटर है और गहराई 15 से 156 मीटर तक नापी गयी है हलाकि इसकी सही जानकारी अभी तक किसी के पास नहीं है |

यह हिलस्टेशन झील के लिए प्रसिद्ध है।

इस जगह में चिड़ियाघर एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है|

जहां आपको हिम तेंदुए की दुर्लभ प्रजातियां , स्टेप ईगल और हिमालयियन भालू, शेर आदि की प्रजातीय मिलती है | अपने विशाल उद्यान के साथ राजभवन के गवर्नर हाउस सार्वजनिक खुले रहने के लिए खुले राज्यभावों में से एक है। नैनीताल में बोटिंग , शौपिंग , पिकनिक स्पॉट और रोपवे , ट्रैकिंग और हाईकिंग आदि चीजों का लुफ्त उठा सकते है | नैनीताल में देखने के लिए निम्न जगह है जैसे की नैनी लेक , नैनीताल जू , एरियल रोपवे ,नैना देवी मंदिर , मॉल रोड ,टिफ़िन टॉप , इको केव गार्डन , राज भवन , किल्बरी हिल्स , स्नो view पॉइंट , गर्ने हाउस , नैना पीक , हनुमान गढ़ी , नैना देवी पक्षी संरक्षण आदि |

यदि आप नैनीताल आना चाहते है तो आप Delhi से Kathgodam by Bus , Taxi ,Train , Private Car आदि से आ सकते है | उसके बाद आप Kathgodam से Taxi , Bike , Bus आदि से Nainital जा सकते है |
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Places to visit in Pangot ( Gauna Hills ) ( गौणा हिल्स )

ये पहाड़ी पगोट हैंमलेट में स्थित हैं |

इस जगह के बारे में ज्यादातर लोगो ने नहीं सुना होगा |

मगर इस पहाड़ी में आप Walking और Trekking अनेक चीजों का लाभ उठा सकते है | यह जगह हिमालयी वनस्पतियों से भरी हुई है |

यह पहाड़ी पेड़ो जैसे कि ओक, बांबू और देवदार के पेड़ के घने जंगलों से घिरा हुई है | इस जगह का पूरा परिद्रश्य बहुत सुन्दर है |

इस जगह तक पहुंचने के लिए बहुत भयानक है।

यह जगह लैंड एंड की तरह ही है | यहां पहुंचना बहुत ही मुश्किल काम है। इस जगह से नैनीताल का बहुत अच्छा दृश्य दिखाई देता है |
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Places to visit in Pangot ( Kunjkharak ) ( कुंजखारक )

कुंजखारक पर्यटन के लिए एक बेहतरीन जगह है | नैनीताल से 37 km की दुरी पर पर स्थित है |

यह जगह हिमालय दृश्य बिंदु है मतलब इस जगह से आप हिमालय के दूर से दर्शन कर सकते है |

खारक का स्थानीय भाषा में मतलब “पास” होता है |

कुंजखारक 2323 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है |

जो राजसी हिमालय रेंज को देखने के लिए सबसे अच्छी जगह बनाती है |

इस जगह से आप पहाड़ों की हिमालय श्रृंखला के एक शानदार 380 किमी दूरदर्शी दृश्य को देख सकते हैं।

कुंजखारक उंच्च लुप्तप्रजाति Khoola (Jhoola) का घर है |

जो की कई कॉस्मेटिक उत्पादों में इस्तेमाल किया जाता है |

Eco-Tourism कुंजखारक का मुख्य आकर्षण है |

Kunjkharak घने ओक, पाइन और देवदार पेड़ के बीच भालू गुफाओं पहाड़ों का पता लगाने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करता है। पक्षी-देखरेख और ट्रेकिंग पर्यटक की संख्या को आकर्षित करती है | लामरेगीयर, हिमालयान और यूरेशियन ग्रिफ़ोन जैसे उच्च ऊंचाई वाले पक्षी जैसे तावे ईगल, स्टेप ईगल और केस्टल जैसे राप्टर यहां देखे जा सकते है |

कुंजखारक के Forest Rest House में रूककर आप कुंजखारक की सुन्दरता का आनंद ले सकते है |

कुंजखारक को नैनीताल से दो तरफ से पहुंचा जा सकता है।

एक नैनीताल से 18 किमी पंगोट तक कुंजखारक के साथ ट्रेक कर सकता है।

इसके अलावा पर्यटकों को नैनीताल से टैक्सियों को किराए पर लिया जा सकता है।

यदि आप पंगोट आये तो इन सभी आकर्षक जगह भी जरुर घूमे |
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Top 5 Hillstation in Uttarakhand !! उत्तराखंड के प्रसिद्ध पांच हिल स्टेशन !

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Top 5 Hillstation in Uttarakhand

उत्तराखंड में शीर्ष 5 लोकप्रिय हिलस्टेशन उत्तराखंड के विशाल हिमालय पर्वत के पहाड़ो पर स्थित है |

यहाँ ऐसे कई पहाड़ी स्टेशन है जो की शांत वातावरण , मनोरम विचार और सुहाना मौसम प्रदान करते है |

उत्तराखंड में वैसे तो बहुत सारे हिल स्टेशन है जहा आप चाहे घूम सकते है | लेकिन आज हम आपको ऐसे 5 हिल स्टेशन के बारे में बताने जा रहे है जहा आप अपने परिवार के साथ यात्रा करके हिल स्टेशन की सुन्दरता का आनंद ले सकते है | 

उत्तराखंड के शीर्ष 5 लोकप्रिय हिलस्टेशन निम्न है |

1.  मंसूरी

2. नैनीताल

3. औली

4. मुनस्यारी

5.कौसानी
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 Hillstation in Uttarakhand – मंसूरी (पहाड़ो की रानी )

उत्तराखंड राज्य के देहरादून जिले से मंसूरी मात्र 35 km की दुरी पर स्थित एक लोकप्रिय हिल स्टेशन है |  यह उत्तराखंड में सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन है |  इस जगह को “पहाड़ो की रानी” के नाम से भी जाना जाता है |

मंसूरी ने “मुसर्जी” या “झाड़ी के मंसूर” के पौधे से नाम प्राप्त किया है जो कि क्षेत्र में बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। मंसूरी 1880 मीटर की औसत उचाई पर गढ़वाल के पहाड़ो पर एक घोड़े की नाल के ऊपर स्थित है | मंसूरी दून वैली और शानदार हिमालय के कमांडिंग नज़ारे प्रदान करता है | इस इलाके में सबसे ऊँचा स्थल लाल टिब्बा है  जो की लन्दौर नामक जगह में है | इसकी ऊँचाई 2,275 मीटर है | मसूरी को गंगोत्री और यमनोत्री का प्रवेश द्वारा भी कहा जाता है |

 इस जगह पर सबसे पहले 1960 में  tibetan school की स्थापना भी गयी है | मशहूर हरे-भरे पहाड़ियों, विविध वनस्पतियों और जीवों और हिमालय के राजसी दृश्य हर साल घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मसूरी से हजारों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मंसूरी में कई दिलचस्प पर्यटन इस्थल है जैसे की केम्प्टी फॉल्स, गन हिल, कैमल की बैक रॉक, झारिपानी फॉल्स, मॉल रोड, चाइल्डर लॉज, भट्टा फॉल्स, धनुल्टी, और कनाताल। यमुना ब्रिज, धनोल्टी, सुरखंडा देवी, चंबा (टिहरी), लाखा मंडल यह वह प्रमुख जगहें पर्वतों की रानी के आसपास की जगहें हैं, यह जगह भी मसूरी से कम खूबसूरत नहीं हैं। मसूरी घुमने-फिरने आए पर्यटक इन जगहों पर भी अवश्य ही आया करते हैं।
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Hillstation in Uttarakhand – नैनीताल (देवी और ताल की भूमि  )

सबसे लोकप्रिय और अतिसुंदर पहाड़ी स्टेशन “नैनीताल” उत्तराखंड राज्य में कुमाऊ क्षेत्र में स्थित है।

नैनीताल की खोज सन 1841 में एक अँगरेज़ चीनी व्यपारी ने की , बाद में अंग्रेजो ने इसे आरामगृह और स्वास्थ लाभ लेने की जगह के रूप में स्वीकार लिया | नैनीताल तीनो दिशायो से घने पेड़ो की छाया में ऊँचे ऊँचे पर्वत के बीच समुन्द्रतल से 1938 मीटर की ऊँचाई पर बसा है | नैनीताल के ताल की लम्बाई 1358 मीटर और चौडाई 458 मीटर है और गहराई 15 से 156 मीटर तक नापी गयी है हलाकि इसकी सही जानकारी अभी तक किसी के पास नहीं है |यह हिलस्टेशन  झील के लिए प्रसिद्ध है।

इस जगह में चिड़ियाघर एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है जहां आपको हिम तेंदुए की दुर्लभ प्रजातियां , स्टेप ईगल और हिमालयियन भालू, शेर आदि की प्रजातीय मिलती है | अपने विशाल उद्यान के साथ राजभवन के गवर्नर हाउस सार्वजनिक खुले रहने के लिए खुले राज्यभावों में से एक है। नैनीताल में बोटिंग , शौपिंग , पिकनिक स्पॉट और रोपवे , ट्रैकिंग और हाईकिंग आदि चीजों का लुफ्त उठा सकते है | नैनीताल में देखने के लिए निम्न जगह है जैसे की नैनी लेक , नैनीताल जू , एरियल रोपवे ,नैना देवी मंदिर , मॉल रोड ,टिफ़िन टॉप , इको केव गार्डन , राज भवन , किल्बरी हिल्स , स्नो view पॉइंट , गर्ने हाउस , नैना पीक , हनुमान गढ़ी , नैना देवी पक्षी संरक्षण आदि |

यदि आप नैनीताल आना चाहते है तो आप Delhi से Kathgodam by Bus , Taxi ,Train , Private Car आदि से आ सकते है | उसके बाद आप Kathgodam से Taxi , Bike , Bus आदि से Nainital जा सकते है |
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Hillstation in Uttarakhand – कौसानी (भारत का स्विट्ज़रलैंड)

कौसानी गरुड़ तहसील में भारत के उत्तराखंड राज्य के अनतर्गत कुमाउं मंडल के बागेश्वर जिले का एक गाँव है |

कौसानी उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले से 53 किलोमीटर उत्तर में स्थित है |

यह पिंगनाथ छोटी पर बसा है | कौसानी से नंदा देवी पर्वत की चोटी का नजारा बड़ा भव्य दिखाई देता है | कोसी और गोमती नदी के बीच बसा कासानी भारत का स्विट्ज़रलैंड कहलाता है | इस सुंदर जगह में प्रसिद्ध हिंदी कवि सुमित्रा नंदन पन्त का जन्म भी हुआ है, जो कौशानी की खूबसूरती की प्रशंसा करते हुए कई कविताओं को लिखते हैं । कौसानी में म्यूजियम में घूमा जा सकता है (जैसे की अनाशक्ति आश्रम और मशहूर कवि सुमितानंदन पंत के घर से बने संग्रहालय में ) |साथ ही साथ में आप कौसानी से त्रिशूल, नंद घुटती और नंददेवी के कौशनी के हाथों से हिमालय की चोटियों के विशाल दृश्य का भी आनंद ले सकते हैं।

More Information :-

कौसानी में छोटी बाज़ार लगती है जहा से आप वहा के ग्रामीणों के हाथ द्वारा बनायीं गयी कौसानी शाल खरीद सकते है और साथ ही साथ आप कौसानी टी एस्टेट से कौसानी की चाय भी खरीद सकते हैं।पर्यटक यहाँ से ग्रामीण के जीवन, कला, संस्कृति और विरासत के बारे में बहुत कुछ सीख सकते हैं जो हिमालयी क्षेत्रों में फैलता है। कौसानी को उत्तराखंड की पहाड़ियों में संस्कृति और देहाती अभी तक आकर्षक जीवन के बारे में सीखने और तलाशने के लिए पर्यटकों के लिए एक पर्यावरण अनुकूल गंतव्य स्थान बन गया है।

कौसानी को एक लोकप्रिय सर्दियों के हिलस्टेशन के रूप में जाना जाता है |

इसलिए हिमपात में गवाह होने के लिए सर्दियों में इस जगह की यात्रा जरुर करनी चाहिए |

यदि आप कौसानी आना चाहते है तो आप Delhi से Kathgodam by Bus , Taxi ,Train , Private Car आदि से आ सकते है | उसके बाद आप Kathgodam से Taxi , Bike , Bus आदि से अल्मोड़ा से 53 किलोमीटर आगे कौसानी जा सकते है |
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Hillstation in Uttarakhand – औली

औली उत्तराखंड का एक भाग है जो की 5 से 7 किलोमीटर में फैला छोटा का सकिंग-रिसोर्ट है |

इस रिसोर्ट को 9500,10,500 की ऊँचाई पर बनाया गया है |

औली का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल, नंदप्रयाग, अलकनंदा और नंदाकिनी नदियों के संगम पर स्थित है।

हिंदू धर्म के लोगो के लिए इस संगम में डुबकी लगाना धार्मिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

आली उत्तराखंड में शीर्ष पहाड़ी स्टेशनों में से एक है, जो अपने शीतकालीन खेलों के लिए अधिक लोकप्रिय है। इस जगह से बर्फ से भरी चोटियाँ बहुत ही आकृषित करती है | इनकी ऊँचाई लगभग 23,000 फीट है |

आली उत्तराखंड में शीर्ष पहाड़ी स्टेशनों में से एक है, जो अपने शीतकालीन खेलों के लिए अधिक लोकप्रिय है। स्की ढलान जो की समुद्र तल से 2500 मीटर और 3,500 मीटर के बीच – भारत में स्नोबोर्डिंग और स्कीइंग के लिए सबसे अच्छे विकल्प हैं।औली की बर्फीली ढलानों पर स्कींइग का भरपूर मज़ा लिया जा सकता है। अल्पाइन स्कीइंग, नार्डिक स्कीइंग तथा टेलीमार्क स्कीइंग का आनंद लेने के लिए ये ढलानें बेहतरीन हैं। एशिया की सबसे लंबी केबल कार औली में है जो 4कि.मी. की दूरी तय करती है।

केबल कार को गोंडोला कहते हैं जिसमें चेअर लिफ्ट और स्की लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध है।

More Information :-

हिमालय क्षेत्र में औली ट्रैकिंग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ जोशीमठ ट्रैकिंग रूट बहुत लोकप्रिय है।

इस क्षेत्र के विभिन्न रास्तों पर ट्रैकिंग करते हुए कामेत, नंदादेवी, मान पर्वत तथा दुनागिरी पर्वत देखे जा सकते हैं । औली उत्तराखंड का एक भाग है जो की 5 से 7 किलोमीटर में फैला छोटा का सकिंग-रिसोर्ट है और इस रिसोर्ट को 9500-10,500 की ऊँचाई पर बनाया गया है | इस जगह से बर्फ से भरी चोटियाँ बहुत ही आकृषित करती है | इनकी ऊँचाई लगभग 23,000 फीट है |

नंदा देवी की चोटी, उगते सूर्य को प्रतिबिंबित करते हुए अधिक सुंदर लगती है |

औली में प्रकृति ने अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है |

प्रकृति का ध्यान रखते हुए इन्हें पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है।

ऐसे में अप्रैल से जून तक भी पर्यटक औली आ सकते हैं।
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Hillstation in Uttarakhand – मुनस्यारी

मुनस्यारी उत्तराखण्ड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक सुंदर गांव है |

जो हिमालयों की मस्तिष्कियों की बर्फ से ढकी हुई चोटियों में बसा है , प्राकृतिक सुंदरता का शानदार हिस्सा प्रदान करता है | जो कि उत्‍तराखण्‍ड में जिला पिथौरागढ़ का सीमांत क्षेत्र है जो एक तरफ तिब्‍बत सीमा और दूसरी ओर नेपाल सीमा से लगा हुआ है। मुनस्‍यारी के सामने विशाल हिमालय पर्वत श्रंखला का विश्‍व प्रसिद्ध पंचचूली पर्वत (हिमालय की पांच चोटियां) जिसे किवदंतियो के अनुसार पांडवों के स्‍वर्गारोहण का प्रतीक माना जाता है |

यह प्राकृतिक हिल स्टेशन समुद्र तल से 2298 मीटर ऊपर की ऊंचाई पर स्थित है ।

बर्फ बारी के आकर्षण की वजह से पर्यटक यहाँ खिचे चले आते हैं |

मुनस्यारी की वादियों में बर्फवारी का लुत्फ़ उठाते हैं।

सर्दियों में काफी बर्फ गिरने तथा हिमालय  शिखरों से घिरा होने के कारण इसे हिमनगरी का नाम भी दिया गया है ।यदि आप लम्बे समय के लिए आये है , तो वन्य जीवन की कई किस्मों को देखने मत भूलना जो कि हिमालयी ग्रिफ़ोन, हिमालयी भालू, वगाटेल, रेवेन, बाज़ , मोलल और कई और अधिक दुर्लभ प्रजातियों से समृद्ध है। जन्मी पतन जगह मुनस्यारी से लगभग 35 किमी / मील की दूरी पर है इसलिए पर्यटकों को ऐसे आकर्षण को जरुर देखना चाहिए ।

” नंदादेवी ” नामक एक बहुत पुराना मंदिर इस परिदृश्य का एक और आकर्षण है ।

More Information :-

मार्च से मई और अक्टूबर से नवंबर तक मुन्सयारी की यात्रा करने के लिए सबसे अच्छी अवधि माना जाता है।

सबसे पहले आपको Delhi से काठगोदाम आना होगा |

काठगोदाम से मुनस्‍यारी की यात्रा बस अथवा टैक्‍सी के माध्‍यम से की जा सकती है|

रास्‍ते में कई खूबसूरत स्‍थल आते हैं। काठगोदाम से चलने पर भीमताल, जो कि नैनीताल से मात्र 10 किलोमीटर है, पड़ता है उसके बाद वर्ष भर ताजे फलों के लिए प्रसिद्ध भवाली है, अल्‍मोड़ा शहर और चितई मंदिर भी रास्‍ते में ही है। अल्‍मोड़ा से आगे प्रस्‍थान करने पर धौलछीना, सेराघाट, गणाई, बेरीनाग और चौकोड़ी है। बेरीनाग और चौकोड़ी अपनी खूबसूरती के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहां से आगे चलने पर थल, नाचनी, टिमटिया, क्‍वीटी, डोर, गिरगॉव, रातापानी और कालामुनि आते हैं।

कालामुनि पार करने के बाद आता है मुनस्‍यारी, जिसकी खूबसूरती अपने आप में निराली है।

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