उत्तरायणी मेला , बागेश्वर (Uttarayani Mela , Bageshwer)

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको उत्तराखंड दर्शन की इस पोस्ट में बागेश्वर जिले में होने वाला प्रसिद्ध मेला “उत्तरायणी मेला” के बारे में जानकारी देने वाले है | यदि आप उत्तरायणी मेले के बारे में जानना चाहते है तो इस पोस्ट को अंत तक पढ़े !

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उत्तरायणी मेला कब और क्यों मनाया जाता है !

उत्तरायणी मेला बागेश्वर उत्तराखंड में मकर सक्रांति या उत्तरायणी के अवसर पर नदियों के किनारे अलग अलग स्थानों में मेले लगते है लेकिन उत्तराखंड तीर्थ बागेश्वर में हर साल आयोजित होने वाली उतरैणी मेले का पर्व कुछ अलग होता है | यह मेला बागेश्‍वर में सरयू और गोमती नदी के तट पर हर साल मकर सक्रांति के मौके पर उत्तरायणी मेले आयोजित होता है | बागेश्‍वर में आयोजित होने वाला उत्‍तरायणी मेला 1 हफ्ते तक चलता है और भारी संख्या में लोग इस मेले में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं | कुमाउं क्षेत्र में उत्तरायणी मेला बहुत मशहूर है | यह मेला 14 January से शुरू होता है | इस मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं | श्रद्धालु सरयू और गोमती नदी के संगम पर डुबकी लगाते हैं और बागनाथ के मंदिर  में भगवान शिव के दर्शन करते हैं एवम् भिक्षुकों को दान-दक्षिणा देकर पुण्य अर्जित करते हैं |

मकर संक्रांति से सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है । शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है , इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाओं का विशेष महत्व है । प्राप्त प्रमाणों के आधार पर माना जाता है कि चंद वंशीय राजाओं के शासनकाल में ही माघ मेले की नींव पड़ी थी । मेले में कुमाउं संस्कृति एवम् ढोड़े, चांचरी, भगनौले, छपेली जैसे नृत्यों का भी आनंद उठा सकते है | धीरे-धीरे धार्मिक और आर्थिक रुप से समृद्ध यह मेला व्यापारिक गतिविधियों का भी प्रमुख केन्द्र बन गया । भारत और नेपाल के व्यापारिक सम्बन्धों के कारण दोनों ही ओर से व्यापारी उत्तरायणी मेला का इंतज़ार करते है । तिब्बती व्यापारी यहाँ ऊनी माल, चँवर, नमक व जानवरों की खालें लेकर आते है और भोटिया-जौहारी लोग गलीचे, दन, चुटके, ऊनी कम्बल, जड़ी बूटियाँ लेकर आते है और साथ में नेपाल के व्यापारी शिलाजीत, कस्तूरी, शेर व बाघ की खालें आदि को लाते है | (उत्तरायणी मेला)

उत्तरायणी मेला सांस्कृतिक एवम् ऐतिहासिक महत्व !

उत्तरायणी मेले को स्थानीय भाषा में घुघतिया त्यौहार या घुघतिया ब्यार के नाम से जाना जाता है | इस संगम स्थल पर उत्तरायणी मेले का विशेष आयोजन होता है जो की कई दिनों तक चलता है | सन 1905 में इ शर्मन ओखले , जो की ब्रिटिश लेखक थे और लन्दन मिशनरीज के साथ भारत आये थे | उन्होंने अपनी पुस्तक “Holy Himalayas” में लिखा है कि “यह मेला कुमाउं का सबसे बड़ा एवम् लोकप्रिय मेला है” | जिसमे पहले के समय में 20,000 से 25,000 श्रद्धालु आते थे |

ऐतिहासिक महत्व

प्राप्त प्रमाणों के आधार पर माना जाता है कि चंद वंशीय राजाओं के शासनकाल में ही माघ मेले की नींव पड़ी थी । 14 January 1921 को मकर सक्रांति के दिन उत्तरायणी के दिन इसी संगम स्थल पर बद्रीनाथ पाण्डे के नेतृत्व में कई हज़ारो आंदोलनकारियो ने अंग्रेजो की कई बेकार प्रथा से सम्बंधित रजिस्टर को इसी संगम में बहा दिया | इसी प्रथा के कारण कुली बेगार प्रथा का अंत हुआ और इस आन्दोलन का सफल नेतृत्व करने में बद्रीनाथ पांडे को “कुर्मांचल केसरी” की उपाधि दी गयी थी | 1929 में महात्मा गाँधी ने इस संगम पर “स्वराज भवन” का शिल्यांश किया | जिसका उपयोग स्वतंत्रा संग्राम के दौरान राजनैतिक और राष्ट्रीय चेतना फैलाने के लिए किया जाता था | ( उत्तरायणी मेला )



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